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कभी-कभी बन्द भी हो जाता है। बहुत क्रोध करने से अक्सर मगन का लोहू चढ़ने का रोग हो जाता है। क्रोध भयङ्कर विष उत्पन्न करता है और सब तरह की खराबी उत्पन्न करता है।
हमें क्रोध ईर्षा, तिरस्कार अथवा वैर वृत्ति धारण करने से अक्सर लज्जा और स्वमान-हानिजनक यातनाएं सहनी पड़ती है; परन्तु वे हमारे शरीर और मन को जो शाश्वत हानि करते हैं उसका हमें जरा भी ज्ञान नहीं होता। .
निरंकुश आवेश शरीर के भिन्न २ तत्त्वों में रसायनिक फेरफार करता है और भयङ्कर विष को जन्म देता है मानसिक बल खोदेने से उसमें बहुत प्रचंड शक्ति आजाती है उसको हम नहीं जानते हैं। सर्व तरह से शारीरिक दुःख पर कोई. शारीरिक अव्यवस्था का परिणाम ही है ऐसा मानने की हमारे में अधिक टेव पड़ गई है और हम दृढ़ता से जानते हैं कि वह दवादि के उपयोग से ही निवृत्त हो सकती है परन्तु हम उसका सच्चा कारण नहीं जानते हैं कि वह मानसिक अव्यवस्था अशान्ति की वजह से उत्पन्न होती है यह बात हमारे दिमाग में नहीं घुसती है।
यह एक सुप्रसिद्ध बात है कि उग्र क्रोध हृदय पर बहुत ही शीघ्र असर करता है और मानसिक शास्त्रवेत्ताओं के क्रोध किये बाद शीघ्र उनको उसी वक्त विष मालूम हुआ है और होता है समस्त आवेश का तोफान पूरा हुए बाद हम अत्यन्त थक जाते हैं और हताश हो जाते हैं उसका सिर्फ कारण यही है कि वे जो मानसिक विष उत्पन्न करते हैं तथा मगज और रक्त में जो दूसरे हानिकारक तत्त्व उत्पन्न करते हैं उसकी वजह से ऐसा होता रहता है। ..
निरंकुश स्वभाव से ज्ञान तंतुओं के केन्द्रों को बारम्बार जो धक्का पहुंचता है. इससे बहुत ही मजबूत शरीर अन्त में नष्ट भ्रष्ट हो जाता है। तुम जब क्रोध करते हो तब २ तुम समस्त स्वाभाविक शारीरिक और मानसिक क्रियाओं में विक्षेप डालते हो। आवेश के तोफानों के सामने तुम्हारे में रही हुई प्रत्येक वस्तु बलवा करती है, मानसिक दुरुपयोग के सामने हरएक मानसिक शक्ति विरोध दर्शाती है। .. क्रोध करने से ज्ञानतन्तुओं की बारीक रचना में बहुत अधिक भयङ्कर हानि होती है एक दम तोफान आने से क्या होता है उसको जो लोग देख सकते हैं