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अनेकान्त 68/4, अक्टू-दिसम्बर, 2015
आध्यात्मिक - भजन
ऐसे विमल भाव जब पावै, तब हम नरभव सुफल कहावै।। टेक।।
दरशबोधमय निज आतम लखि,
परद्रव्यनिको नहिं अपनावै।
मोह-राग-रुष अहित जान तजि, झटित दूर तिनको छुटकावै।। ऐसे विमल भाव... ।।1।।
कर्म शुभाशुभबंध उदय में, हर्ष विषाद चित्त नहिं ल्यावै।
निज-हित-हेत विराग ज्ञान लखि, तिनसौं अधिक प्रीति उपजावै।। ऐसे विमल भाव...।।2।।
विषय चाह तजि आत्मवीर्य सजि
दुखदायक विधिबंध खिरावै।
"भागचन्द' शिवसुख सब सुखमय, आकुलता बिन लखि चित चावै।। ऐसे विमल भाव...।।3।।
- कविवर ‘भागचन्द'