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________________ 104 अनेकान्त/54/3-4 भी कहा गया है। अनेक गुण और पर्याय युक्त द्रव्य के मूल षड्भेद हैं-जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल'। प्रथम जीव-द्रव्य का जैन दर्शन में स्वतन्त्र द्रव्य के रूप में विशद विवेचन प्राप्त होता है। उसी का संक्षिप्त निर्देशन किया जा रहा है जीव का सामान्य स्वरूप उपयोग है। उपयोग का अर्थ है-ज्ञान और दर्शन। जानोपयोग दो प्रकार का है-स्वभावज्ञान और विभावज्ञान। जो केवल-निरुपाधिरूप, इन्द्रियातीत तथा असहाय अर्थात् प्रत्येक वस्तु में व्यापक है, वह स्वभावज्ञान है और उसी का नाम केवलज्ञान है।" विभावज्ञान सज्ज्ञान और असज्ज्ञान के भेद से दो तरह का है। सज्ज्ञान चार प्रकार का है-मति, श्रुत, अवधि और मन:पर्यय। कुमति, कुश्रुत और विभंगावधि के भेद से असज्ज्ञान तीन प्रकार का है। इसी प्रकार दर्शनोपयोग भी दो प्रकार का है-स्वभावदर्शनोपयोग और विभावदर्शनोपयोग। जो इन्द्रियरहित और असहाय है, वह केवल दर्शन स्वभावदर्शनोपयोग। जो इन्द्रियरहित और असहाय है, वह केवल दर्शन स्वभावदर्शनोपयोग है। चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन और अवधिदर्शन ये तीनों विभाव दर्शनोपयोग हैं। ज्ञानदर्शनरूप उपयोगमय जीव ही आत्मा है। चेतयिता है। अकलंकदेव ने कहा है कि दशसु प्राणेषुयथापात्तप्राणपर्यायेण त्रिषु कालेषु जीवनानुभवनात् जीवति अजीवीत् जीविष्यति वा जीवः, राजवार्तिक 9/47/25। जैन दर्शन में जीव (आत्मा) के स्वरूप का प्रतिपादन सभी दर्शनों को दृष्टि में रखकर किया गया है। इसके स्वरूप से सम्बन्धित प्रत्येक विशेषण किसी न किसी दर्शन से सम्बन्ध रखता है-जैसा कि नेमिचन्द्र सिद्धान्तदेव की गाथा से स्पष्ट है जीवो उवओगमओ अमुत्ति कत्ता सदेहपरिमाणो। भोत्ता संसारत्थो सिद्धो सो विस्ससोड्ढगई।। - द्रव्यसंग्रह, 2 जीव, उपयोगमय है, अमूर्तिक है, कर्ता है, स्वदेहपरिणामी है, भोक्ता है,
SR No.538054
Book TitleAnekant 2001 Book 54 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaikumar Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year2001
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size8 MB
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