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53/3 अनेकान्त/43 भी अर्द्ध द्वादशांग के पश्चात् प्रथम स्थान पर रखा गया है। इससे सिद्ध होता है कि चारित्र की महिमा सर्वोपरि है। सम्यक्दर्शन एवं ज्ञान सम्यक्-चारित्र के लिए है, दर्शन-ज्ञान गायक है, चारित्र गेय है। रागद्वेष की निवृत्ति अर्थात् वीतरागता चारित्र से प्रकट होती है, कहा भी है,
मोह तिमिरापहरणे दर्शनलामाद्वाप्तसंज्ञानः।
रागद्वेष निवृत्यै चरणं प्रतिपद्यते साधुः।। 47 ।। -मोहान्धकार दूर होने तथा सम्यक्त्व एवं ज्ञान-प्राप्ति होने पर साधु अर्थात् समीचीन ज्ञान रागद्वेष निवृत्ति हेतु चारित्र अंगीकार करता है
___ संवर के कारणों का उल्लेख करते हुए सूत्रकार प्रातःस्मरणीय आ. उमास्वामी कहते हैं,
“स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः।" (9-1) ___ अर्थात् संवर आस्रव निरोध) गुप्ति, समिति, धर्म अनुप्रेक्षा, परीषहजय और चारित्र से होता है। ये सभी कारण आचरण रूप हैं। इनसे निर्जरा भी होती है। केवल सम्यग्दर्शन-प्राप्ति से सिद्धि नहीं होती। कर्मक्षय हेतु तप-संयम-चारित्र ही अनिवार्य रूप से (साक्षात् रूप से) आवश्यक हैं, करण हैं, नियामक कारण हैं। सम्यग्दर्शन तो चारित्र को दिशा देता है। मोक्षमार्ग त्रितयात्मक है,
“सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्गः" ।। 1 ।। तत्त्वार्थसूत्र।।
“सदृष्टिज्ञानवृत्तानि धर्मं धर्मेश्वरा विदुः।” रत्नकरण्ड-3।। चारित्र को अंत में रखने से ज्ञात होता है कि सम्यत्व से पहले भी चारित्र की उपयोगिता है तथा बाद में भी। चारित्र होने पर ही मोक्षमार्ग की सफलता है। सम्यक्त्व प्राप्ति हेतु भी सम्यक्त्व चरण चारित्र (अष्टांग एवं पच्चीस दोष निवृत्ति रूप चारित्रं) की आवश्यकता कुन्दकुन्द स्वामी ने चारित्रपाहुड़ में उद्घोषित की है। संयमचरण-चारित्र्य तो सम्यक्त्व चरण का भूषण है, उपादेय है। चारित्र संयम की महिमा का गान अव्रत सम्यग्दृष्टि इन्द्र आदिक सभी करते हैं। मनुष्य पर्याय में संभव होने से उसकी प्राप्ति हेतु छटपटाते हैं।
किसका कितना महत्त्व? इस प्रश्न का उत्तर सापेक्ष दृष्टि में निहित है जो जीव गृहीत मिथ्यात्व (कुदेन कुशास्त्र; कुगुरु की श्रद्धा) की भूमिका में हैं, उनके लिए सम्यक्त्व का अर्थात् यथार्थ देव-शास्त्र-गुरु की श्रद्धा का अत्यधिक महत्त्व है। पुनश्च यथार्थ तत्त्वज्ञान की स्थिरता के लिए सम्यक्त्व के अष्टांग