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________________ तीन अप्रकाशित रचनाएं श्री कुन्दनलाल जैन प्रिंसिपल, दिल्ली इस वर्ष (जून ७५) ग्रीष्मावकाश में मध्यप्रदेश के (१) बालमणी वित्त-दशलक्षणी के बारह कवित्त विभिन्न गांवों एवं नगरों में जाने का सुपवसर प्राप्त हुना। बडे ही सरस और आध्यात्मिकता से प्रोतप्रोत हैं। लगभग दो-ढाई हजार किलो मीटर की यात्रा की होगी। प्रत्येक धर्म पर एक एक कवित्त हृदय को छ जाने वाला अपनी प्रादत के अनुमार, जहा भी जाता हूं, पाडुलिपियो है। इनके कर्ता का स्पष्ट प्रमाण प्राप्त नही होता है, पर की तलाण किया ही करता है और जहा जो कुछ उप- हर कवित्त में माया परदौनु शब्द का प्रयोग मिलता है लब्ध होता है उसे ग्रहण करने का भरपूर प्रयत्न करता ह। जिससे प्राभास होता है कि इनके कर्ता कोई मायासिंह, प्रबकी बार सेठ मिश्री नाल जी करेरा के सौजन्य से स० माया प्रमाद या माया राम नाम के कवि होंगे और १७०१ का लिपिबद्ध 'बनारसी विलाम सुन्दर, सुवाच्य परदौनु इनका अपना उपनाम, उपाधि या विशेषण जैसा लिपिवाला कलात्मक हग से लिखा हुमा प्राप्त हुमा। कुछ प्रतीत होता है । जो भी हो, पर कवित्तों को देखकर साह मोतीलाल जी दुर्जन लाल जी से स. १८०० के ऐसा लगता है कि माया परदीनु जी को अपने समय का लगभग की लिखी नेमिचन्द्रिका और सेठ राजाराम जी कोई बड़ा ही प्रतिभाशाली सशक्त कवि होना चाहिए और वांमगत बालों से एक बहुत मोटा गुटका प्राप्त हुना इनकी कई मर भी कृतियां उपलब्ध होने की कल्पना जिसमें सैकड़ों पूजायें, स्तोत्र, कवित्त, विनतिया आदि सग- की जाती है। यह सब शोध और खोज का विषय है। ग्रन्थागारो को कुछ बारीकी से पथोलने पर कवि के विषय इस गुटके की लम्बाई-चौडाई "X६" है। प्रत्येक मे कुछ और जानकारी प्राप्त हो सकेगी। फिर भी, सहृदय पन्ने में १२-१२ पंक्तियां है और प्रत्येक पक्ति में ३०-३० पाठक इन कवित्तो की अर्थगरिमा और रचनाशैली से मार हैं । इस गुटके का पूर्णतया निरीक्षण करने पर भी प्रभावित हुए बिना न रह सकेंगे। ऐसे सुन्दर और सरस इसका लिपिकाल कही नही मिला । सभव है कि प्रादि प्रत एवं रोचक कवित्त प्रायः सुलभ नही होते है, कृपालु पाठकों के फटे हए पन्नों में कही लुप्त हो गया हो, पर चूकि इसमें को कवि माया परदौनु के विषय मे कुछ जानकारी उपप. बनारसीदास जी की रचनाए मगृहीत है. अतः इसके लब्ध हो तो मुझे अवश्य ही सूचित करें। मैं उनका प्रत्यलिपिकान की प्राचीनता स. १७०० के लगभग तो धिक ग्राभार मानूगा। निश्चित रूप मे पहुच हो जाती है। गुटका बहुत ही जीणं स्थिति में है। इसके बहुत से पन्ने काट कर निकाले गये (२) वाणवसी-दाणदसी चौदह छंदों की छोटीहै। बहुत-से पन्ने अत्यधिक जीर्णशीर्ण दशा में है और कुछ मी रचना है जिसमे चार दोहे और दस चौपाया बतही प्रस्त व्यस्त दशा में है। पत्र सम्पा भी कई जगह है। इन छन्दो में कवि ने गो, स्वर्ण, दासी, भवन, गाज, बदलती है। इसमे कुल पत्रो को मरूपा लगभग एक हजार तुरग, कलत्र, तिल, भूमि प्रौर रथ इन दश बानो का होगी और छोटी-मोटी रचनाए लगभग दो सौ से अधिक जो वर्णन शास्त्रो मे मिलता है, उसका माध्यात्मिक दृष्टि हैं। इनमे से सलान तोन रचनाए - (१) दशलक्षणी मे बडा ही सुन्दर विश्लेषण किया है। जैन तत्वज्ञान की कवित्त, (२) दाणसी पोर (३) वद्वमानस्लोत्र सर्वया दष्टि से उपयुक्त दानो का जो विवेचन इन छदों में किया प्रप्रकाशित और उच्च कोटि की रचना पतीत हुई। अन गया है वह निश्चय ही बडा श्रेयस्कर और अध्यात्म उन्हें यहा अविकल रूप से प्रकाशित किया जा रहा है। प्रमियो को प्रापित करने वाला है। इस रचना के
SR No.538029
Book TitleAnekant 1976 Book 29 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1976
Total Pages181
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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