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________________ छोहल की एक दुर्लभ प्रबन्ध कृति 0 श्री अशोककुमार मिश्र जैन प्रबन्ध-काव्यों की परम्परा का मूल स्रोत अप- पंडित देषो न घरह विचारी, खोटं पर्व लोज्यौ सवारी १९५॥ भ्रंश में विद्यमान है। इसका पूर्ण विकास भक्तिकालीन काम कथा रस रसीक पुराण, लहै भेद सो चतुर सुजाण । हिन्दी जैन काव्यों में पाया जाता है। सोलहवीं शताब्दी पठत गुणन जा होई वीस्तार. जयो सवनि के ऐकाकार १९६। के बैन कवि छीहल की अब तक प्रायः मुक्तक रचनायें -इति श्री माथवानल की कथा कंदला की कथा उपलब्ध होने के कारण उन्हें मुक्तक काध्य का रचयिता संपूर्ण समाप्त ॥ समझा गया। उल्लेखनीय है कि कवि ने दोनों ही प्रकार रचनाकाल --कवि ने कथा के अन्त मे इसका रचना की रचनायें की। उनकी एक प्रबन्ध कृति हारवर्ड विश्व- काल इस प्रकार दिया हैविद्यालय अमेरिका के संग्रहालय में उपलब्ध हुई है। यह पन्द्रा से इकहतरी सार, झोरी पाचं मास कुवार । कृति सर्वथा अज्ञात रही, भारतवर्ष में इसकी पांडुलिपि जया सकति मति सार कही, कवि छोहल जंपी चौपही ।१९३ मिलने की सूचना प्रभी तक प्राप्त नहीं हुई है। इस प्रबन्ध प्रतएव यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि कृति का नाम है-माधवानल कथा। कवि ने अपने समय कवि ने इसकी रचना संवत् १५७१ (१५१४ ई.) में की सर्वाधिक लोकप्रिय कथा को लेकर इस काव्य की की रचना की, जो उनकी प्रब तक उपलब्ध समस्त रचनामों कथानक-गणपति की वदना करने के पश्चात् कवि की तुलना में अधिक विस्तृत और सरस कही जा सकती माधवानल-कामकदला की कथा लिखते हुए कहता हैहै। इसका प्रादि मोर अन्त इस प्रकार है - पुहपावती नगरी का राजा गोविदचन्द प्रत्यन्त शक्तिशाली प्रादि तथा वैभव-सम्पन्न था। उसके रनिवास मे सात सौ सुन्दर गणपति गयो गुणह प्रसेस, उदर वाहन चढ्यो नरेस । रानियां थी। उसकी पट्टमहिषी का नाम रुद्र महादेवी घधर पाय कर झुणकार, पणऊ सिषि बुषि दातार १२ था। उसकी नगरी में सभी लोग सुख से जीवन व्यतीत समर ब्रह्मा रच्यो संसार, फुणि सुमिरै सकर त्रिपुरारि। करते थे। कही पर भी कोई दुःखी अथवा निर्धन नही सर तैतीस ... गती माह, कर नोरं पर लागे पाहं।। था। उसी नगरी मे कामदेव के समान अत्यन्त सुन्दर, कासमीर गिरि थानर बन्न, वाहण हंस छत्र सो वर्ण। आकर्षक तथा सर्वकलासम्पन्न ब्राह्मण कुमार माधव भी वीणा पुस्तक नेवर पाय, नमस्कार दुति सारद माय ।। निवास करता था। उसके सौन्दर्य से अभिभूत होकर नमत मति होई घणी, कर्थ कथा नल माधव तणी। नगर की स्त्रियाँ व्याकुल होकर अपने तन की सुधि-बुधि पोरीमति मत होई घणी, करी प्रसाद माता भार हीण ४, भी बिसरा देती थी। किन्ही-किन्ही के तो गर्भपात भी हो जाते थे। यह देखकर नगर निवासियो का एक प्रतिनिधिकथा पाल प्ररथ प्रसेस, नर प्रबोष मति मही प्रवेस । मण्डल राजा के पास गया और वहा जाकर उससे माधव प्रगम प्रमेव कठिण सी खरी, को राज्य से निष्कासित करने के लिए विनय की। उन्होंने सरस बहत कवि छोहल करी ।१९४। कहा कि यदि माधव राज्य से बाहर नहीं जायेगा तो वे पुरबकपा मति देखी जीसी, तिहि पट तरि मौ जंपी तीसी। सभी राज्य को छोड़कर चले जायेंगे। राजा ने परिस्थिति १.(प्र-बंधु (बाँधना)+घञ्) यहाँ प्रबन्ध से हमारा तात्पर्य कथाप्रधान रचना से है, महाकाव्य प्रादि से नहीं।
SR No.538029
Book TitleAnekant 1976 Book 29 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1976
Total Pages181
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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