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चंदनबाला
• १०८ धर्म थान शासन (अ6पाfss) विशेषां - u. ४-११-२००८, भंगणार • वर्ष - २१ .
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चंदनबाला
परस्त्री को आप घर लायें हो लेकिन मैं सहन नहीं करूंगी। इसे घर से बहारनिकाल दो । घर से ऐसे वचन सुनकर वसुमति को लेकर सैनिक बाजार में बेचने चला । बाजार में वसुमति
का रुप देखकर कई खरीदनेवाले तैयार हो गये । गाँव की चंपापरी का राजा दधिवाहन चेटक राजा कि पुत्री
वेश्याएँ उसे खरीदना चाह रही थी । एक वेश्या ने वसुमति पद्मावती जिसका दूसरा नाम धारिणी - से ब्याह कीया था।
का हाथ पकडा तो राजकुमारीने उसको पूछा, 'तुम्हारा उन्हें वसुमती नामक पुत्री थी । वह दधिवाहन राजा को
कुल कौनसा है और तुम करती क्या हो ?' वेश्या ने उत्तर शतानिक राजा के साथ दुश्मनी थी । उस कारण शतानिक
दिया, 'तुझे कुल से क्या काम ? उत्तम वस्त्र और उत्तम राजा ने अपने अन्य के साथ चंपापुरी पर घेरा डाला । घोर युद्ध
भोजन हमारे यहां तूझे मिल जायेगा । वसुमति समझ हुआ । हजारों मनुष्य उसमें मारे गये । दधिवाहन राजा राज्य
चुकी थी कि ये तो वेश्याएँ हैं। इससे उनके साथ जाने की छोडकर भाग गया। शतानिक राजा ने चंपापुरी को लूटा । एक
मनाही कर दी। उसे ले जाने के लिये वेश्याओं ने बल का सैनिक ने दधिवाहन राजा की रानी धारीणी और पुत्री वसुमती
आसरा लिया। उस समय वसुमति चित्त से बड़ा खेद व्यक्त को पकड़ा।
करने लगी । उसके शील की रक्षा के लिये एक देव ने सैनिक ने धारीणी को अपनी स्त्री बनने को कहा आकाश में से उतरकर वेश्या का नाक काट डाला । और लेकिन धारिणी ने सैनिक को धूत्कार कर कहा : 'अरे ! अधम उसकी काया काली तुंबी जैसी कर डाली । इससे वेश्याएँ और पापीष्ट ! तू यह क्या बोल रहा है ? मैं परस्त्री हूँ, और घबराकर अपने घर चली गई । सुभट वसुमति को बेचने परस्त्री लंपट तो मरकर नरक को जाता है ।' सैनिक ने दूसरे बाजार में गया । वहाँ धनावह श्रेष्ठी उसे खरीदने धर्मवचनों को अनसून कर धारिणी का शील खण्डन करने के
आया । उसे राजकुमारी ने उन्हें पूछा, 'आपके घर में मुझे लिए उस पर बलात्कर करने लगा तो धारिणी ने प्राणत्याग कर क्या करना होगा ?' सेठ ने कहा, 'हमारे कुल में जिन देवों दिया । माता के वियोग से वसुमती विलाप करने लगी। करुण
की पूजा, साधूओं की सेवा, धर्मश्रवण, जीवदया पालन आक्रंद करती हुई कहने लगी, 'हे माता! तू मेरे उपर का स्नेह आदि होता हैं।' धनावह सेठ की ऐसी बात सुनकर हर्षित छोड़कर चल दो। मुझे अब पराये हस्तों में जाना पड़ेगा, उससे होकर वसुमति कहने लगी, 'हे सुभट ! यदि तू मूझे बेचना | तो अच्छा हो गया होता कि मेरी मृत्यु हो जाये ।' इस प्रकार | चाहता है तो इस सेठ को बेचना ।' सैनिक ने उसे सेठ को रोते-मचलते हुए मृत माता के चरण पकड़ लिये और 'तुझे मैं बेच दिया । सेठ वसुमति को घर ले गया । इस प्रकार अब नहीं जाने दूंगी, मुझे छोड़कर नहीं जाने दूंगी' - ऐसा | राजपुत्री शुभ कर्म से भले घर पहुंची। करुण विलाप करने लगी।
सेठ की स्त्री मूला उसे देखकर सोचने लगी । मेरा वसुनती के ऐसे रुदन वचन सुनकर सैनिक ने 4 पति इसे स्त्री बनाकर रखने के लिये लाया लगता है। इस कहा : 'हे मृगाक्षी ! मैंने तूझे कोई भी कुवचन नहीं कहे . . समय तो उसको वह पुत्री कह रहा है, लेकिन पुरुष का हैं। तू एसा सोचना भी मत कि मैं तुजसे शादी।
* मन कौन समझ सकता हैं? करुंगा ।' इस तरह वसुमति को समझाकर।
धनावह सेठ ने वसुमति का नाम धारीणी के शरीर पर से हार वगैरह मुख्य मुख्य
चंदनबाला रखा, जिससे वसुमति अब चंदनबाला नाम अलंकार उत र लिये और वसुमति को अपने घर ले गया।
सेपहचानी जाने लगी। घर पर उसकी स्त्रने उसे कटु वचन शब्दों मे सुना दिया कि इस
एक बार मूला सेठानी पड़ौसन के घर गई होगी।
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