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शैलक राजर्षि एवं पंथक मुनि
वि.सं. २०६४, आसो सुE-७, भंगणार .
७-१०-२००८.१०८ धर्म था विशेषis
शैलक राजर्षि पांचसौ शिष्य के साथ विचर रहे थे। ज्ञान, ध्यान के साथ वे उग्र तपश्चर्या करते थे। लगातार आयबील का तप
और रुखासुखा भोजन करने से, उनके शरीर में 'दाहज्वर' का रोग हुआ। परंतु उनको तो शरीर पर ममत्व ही नहीं था। रोग होने पर भी वे इलाज नहीं करातेथे।
के साथ साथ पुष्टिकारक व्यंजन भी आने लगे। मद्यपान के साथ ये स्वादिष्ट व्यंजन और पूर्ण आराम के कारण शरीर आलसी बनता गया । धीरे धीरे प्रतिक्रमण पडिलेहन भी छूटता गया। स्वादिष्ट व्यंजन खाना, मद्यपान करना और आलस के कारण सोना-ऐसा नित्यक्रम हो गया शैलकाचार्य
का।
पांचसौ शिष्यों के परिवार के साथ वे शेलकपुर पधारे, जहाँ राजा - मंडुक राज्य करते थे। वे एक दिन आचार्य का दर्शन करने आये। दर्शन वंदन करके उन्होंने आचार्य देव की कुशलता पूछी और ज्ञात कर लिया कि गुरुदेव दाहज्वर से पीडीत है और शरीर निरा कृश बन चुका है।
राजा ने आचार्य श्री को बिनती की, 'हे कृपावंत ! आप यहाँ स्थिरता करें । रोग की चिकित्सा करने का मुझे लाभ दीजीये । आप निरोगी होगें तो अनेक जीवों को उपदेश द्वारा उपकारी होंगे। इसलीये मेरी प्रार्थना स्वीकारे।'
मद्यपान वाकई में अच्छे-अच्छे का पतन कराता है। आचार्य तो भूल गये कि 'मैं साधू हूँ। मैं पांचसौ शिष्यों का गुरु हूँ।भूल गये कि मैजैनधर्मका आचार्यहूँ।
सबशिष्य सोचने लगे कि अब क्या करना । साधारण संयोग में गुरु को उपदेश नहीं दीया जा सकता । शायद दो अक्षर कहे तो नशे मे चकचूर गुरु कुछ सुने ऐसेन थे। धीरे धीरे शिष्य गुरु को छोड़कर अन्य आचार्यों के पास चल गये। उन्हें अपना चारित्र संभालनाथा।
कुशल वैद्यो द्वारा आचार्य श्री की चिकित्सा प्रारंभ हुई, परंतु कुछ दिन की चिकित्सा के बाद कुछ फर्कन दिखातो वैद्यो ने मुनियों को कभी भी खपता नहीं हो परंतु रोग निवारण के लिये 'मद्यपान' करने के लिए कहा । हरेक नियम . का अपवाद हो सकता है ऐसा समझकर आचार्यश्री ने दवाओं के साथ मद्यपान करनाशुरु किया।
शरीर निरोगी बनता गया परंतु .
परंतु एक शिष्य 'पंथक मुनि' ने गुरु को किसी भी प्रकार से पुन: सन्मार्ग पर लाने की आशा के कारण गुरु का त्याग न किया वह मार्ग भूले गुरु से सटा रहा। उनकी सेवा सुश्रुषा जारी रखी। 'गुरु परम उपकारी है। इस समय उनका पापोदय है। परंतु ऐसे समय पर गुरु का त्याग ठीक नहीं है। एक दिन जरूर उनकी आत्मा जागेगी और पुन: संयम में स्थिर हो जायेंगे। इस प्रकार कई दिन बीत गये। पंथक मुनि गुरु की वैयावच्च बराबर करते रहे।
इस तरह चातुर्मास पूर्ण हुआ । शैलकाचार्य की . स्थिति तो वही बनी रही, खाना पीना और सोना।'
चौमासी प्रतिक्रमण का समय हुआ। पंथक . मनिवर ने समयोचित प्रतिक्रमण प्रारंभ किया। त प्रतिक्रमण की क्रिया में जब महाराज से क्षमापन • की क्रिया आयी तोपंथक मनिने धीरे से गुरुदेव के चरणों
कमजोरीतोथी। राज्य के रसोईघर से घी-दूध | पर हाथ रखा।