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જૈન કોન્ફરન્સ હેરલ્ડ.
इहसूर्य - एकैकमर्धमंडलमेकेनाऽहोरात्रेण परिसमापयति, तस्यचाऽहोरात्रस्ट द्वापष्ठिर्भागा क्रियते तत्राहो रात्रगता - एकषष्टि भागा कस्यास्तिथेः परिमाणं इसका अर्थ यह है की - सूर्य एक २ मंडलके आधे भागमें, जब जाता है, उतने समय (काल) मे - एकदिन रात खतम होती है-उस अहोरात्रिके बासठ ६२ भाग करे उसमे के एकसठ ६१ भागपर चंद्रमंडल पहुंचे-एक दिन रातमें उतने समय कालको एक १ तिथि परिमाणकाहा - अबचंदस्सहाणिवुठि ) इस पाठका माइना बतलाते है टीकाकार - चंद्रमंडलस्य कृष्णपक्षे यावता कालेनैकैक षोडशोभागो द्वाषष्ठि भाग चतुष्टय प्रमाणो हानिमुपपद्यते - यावता कालेन शुक्लपक्षे एकैकः षोडशोभाग प्रागुक्त प्रमाण परिवर्धते कला तावत्कालप्रतिमातिथयः ( इसका माइना - कृष्णपक्षमें - चंद्रमंडलका जितना कालकरके एक २ शोलमा हीस्सा - दिवस रात्रिके बासठ ६२ भाग चतुष्टय प्रमाण हानिको प्राप्त होती है-उतनाही कालकरके शुक्लपक्षमें बढता है. और खुलासा - एक दिवस रात्रिके बासठ ६२ अंक है उसमें शोले १६ का भाग देओ लब्ध अपूर्ण ४ आये याने ४ भागमें कुछ कमति संख्या हुई इतने हिस्से ( भाग ) प्रमाण हमेसा चंद्रमां घटता बढ़ता है इस हिस्सेको कला-कहि गई है. सारांश यह निकला की - चंद्रमाकी शोले कला है. प्रतिदिन एकैक कला घटती बढती है. कृष्णपक्षमे घटती हे शुक्लपक्षमे बढती है. दरेक पंदरा दिनमे पंदरा कलाओकी हानि वृद्धि होती है. एक कला हमेशा कायम रहती है इस हिसाब से शोले कलात्मक चंद्र कहा जाता है. अब यहां सवाल पैदा होता है. क्या ? चंद्रबिंब घटता बढता रहता है अगर घटता बढता हैतो स्वस्वभावसे हे या परसे ? जवाब मे देखा गया तो - ज्योतिष्करंडक पयन्ने के आधार से यह मालुम हुवा - की - चंद्रबिंबको कोई खामिनही वो हमेसा स्वच्छ स्फटिकमिव स्वस्वभावमे रहता है. उसके नीचे जो ध्रुव राहु है उसका विमान चार अंगुल दुर हमेशा रहता है उसका स्याम वरण है वो हमेशा चंद्रमा की एकैक कलाको प्रतिपक्ष- ढाकता-व उघाडता रहता है - या ते चंद्रमा की हानि वृद्धि कही गई है.
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अब पीछे तिथि विषय पर आते है. वाचकवृंद कहेंगे- यहतो माना. परंच तिथिका घटना बढना भि बतलाओ जबाबमे देखागया तो यही सबूत मिला, की चंद्रमडल हमेसे दिवस रात्रिके ६२ बासठ भागमेंसे एकसठ भागतक पहुंचता है. ज्यादे नही. एक भाग हमसे अर्ध सूर्य मंडलका चंद्रमाकी अपेक्षा खाली रहा. उसको क्षय समजो . ( वाचकवृंद यह स्थल बहुत गोर करणेका है. ) जैसे आजरोज सूर्योदयसे दिन