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वरिप्रभु की वीरवृत्ति
( तर्ज - राधेश्याम राधेश्याम ... )
अढाई हजार वर्ष का प्रसंग है, शान्ति को अपने साथ लिये । खडे हैं जोगी जंगल में, परम ज्योति का ध्यान किये भरवाड़ कोई आता है वहां, साथ में अपने बैल लिये। कहता है वचन जोगी से ऐसे, जाता हूं घर कुछ कार्य लिये रखना ध्यान इन्हीं बैलों का, जो खड़े आप के पास कीये । जाने न पावे बैल कहीं, इसका रखना ध्यान दीये इतना कह वह चला गया, चरते हुवे बैल भी कहीं गये । मस्त ध्यान में है योगी, विश्व प्रपंच को दूर कीये वापिस घर से भरवाड़ चला, जहां योगी रहे थे ध्यान कीये । वहां नहीं देखकर बैलों को, योगी से उसने प्रश्न कीये शीघ्र बताओ ओ योगी !, जो बैल खड़े थे कहां गये ? देते हो उत्तर नहीं मुझको, क्यों बात मेरी सुन मौन हुवे ? मालुम होता है मौन की कारण, तुम्हींने कुछ प्रपंच किये । अभी बताये देता हूं, जो नहीं सुनते हो मुझ प्रश्न कीये चला कुल्हाड़ी लेकर के, जहां शर्करा वृक्ष थे रहे हुवे । चढ़ा वृक्ष पर डाली काटी, संग डाली को लिये हुवे फिर वोला आकर योगीले, अब भी बतलाओ कहां गये ? नहीं सुनोगे मेरी बात तो पछताओगे कार्य कीये महायोगी व महातपस्वी आत्म ध्यान में मस्त हुवे । अवलोकन करते पूर्व समय का, जब त्रिपृष्ठ वासुदेव हुबे राजा हो आज्ञा दी थी निद्रा मुझे, आजाये तो देना गायन बन्द कीये । शय्यःपाल मस्त हुवा गायन में, नहीं गायन उसने बन्द कीये जब निंद खुली राजा देखते हैं, गायन वह चालु हो रहे । बडे क्रोध में हो राजा ने उससे ऐसे बैन कहे अरे दुट ! नहीं मानी आज्ञा, तो इसका फल भी तु चखले । गर्म गर्म शीशा मंगवाकर तुरत कर्ण इसके भरदे
कर्ण में शीशा गर्म उसके भरा, भरवाड बना है वही आत्मा, पूर्व समय का यही द्रष्य, बनाकर मेखों को,
फिर शय्यापाल वह मरके । योगी से कहता आकर के योगी तो अवलोक रहे । योगी के कर्ण में लगा रहे
भरवाड
१ काट की कीलें ।
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