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२२ है विषवस्तु परिवर्तनशील मित्र ! होते चरित्र जवके सब है विचित्र ; है सौख्यमें सुख जीपा रहेता अदृश्य, दुःखान्तमें प्रकटता सुख शांति दृश्य. जाइ दुइ कलहसें किसकी चलाइ, त्यागो सतर्क नित्य आपसकी नमार; राखो सदैव सवसे शुचि साधुनाव, होगा कनी फीर नहि मुखका अभावः। जो अन्य अप गुणजी गिरिसा विचारे, है सन्त सो सविधि पूज्य सदा हमारे; होते प्रफुस करके गुण जो विनोक, वे स्वर्ग तुव्य करते यह मत्येवोक. ५ होती अलक्षित अहर्निश आयु कीण, आलस्यमें सतत् तुं नर हो न लीन; कर्तव्यमें निरत हो तज मुढ माया, खो पाप न यह पुर्वज दिव्य कापा. ६ क्यों चूतकालिक सुम्योपर खेद पाने, नाइ गये दिन कजी फीर है. न पाते; लो वर्तमान अपने कर सर्व कार्य, सत्कार्य जात कुबको रखते न आये. ७ तुं धर्मसे विमुख हो रहता सदैव, आमोद सिंधुजनमें बहता सदैव; .. है सौख्य लोग नर जीवनका नकाम, हो जोगलिप्सु मत तुं बन रोगधाम... तुं जिन्नता विषयका तन निंद्य गान, संसारको निज कुटुम्ब समान जान; निष्काम हो सुःखीतको दुःखसे नगार, है धर्म सार वश एक परोपकार. ए हे सर्वथा सहज मौखीक धर्मशिक्षा, लेना वा मुगम है शुज साधुदीका; है किन्तु शुष्कर वर्मी इनकी समीक्षा, हानी यथा समय है सबकी परीका.१० लाखो हुए नृपति वैभव शक्ति पूर्ण, हा ! मृत्यु के मुग्घ हुए पम सब चूर्ण है और अन्य जनका तब क्या ठिकाना, सफर्ममें पद नहि अपना हाना..' सेवा सदैव जगको करना सनक्ति, सधर्मका पथ सदा धरना सन्नक्ति; आपत्ति दीन जनका हरना सनक्ति,आनंदरों अजय हो मरना सत्नक्ति.१२
गधरा. हिंसा आवस्य इा, कलह रुज वृणा, फुट चिन्ता विषाद , हो जावे लोप सारे, व्यसन अव व्यथा, मोह माया प्रमाद : काम क्रोधादि तृष्णा, तन जगत करे, धर्म स्वातंत्र्य पान , पाचे संसार सारे, मुख नित करते, शांति संगीत गान •
'सरखती.. १ पर्वत जेवा,
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