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________________ किरण ३] वंगीय जैन पुरावृत्त । १०१ है अनेकों धर्मसंघर्ष में कितने ही विभिन्न सम्प्रदायोंके प्रबल इन सब महात्माओंके प्रयाससे सहस्रों लोग जैनधर्ममें अाक्रमणोंसे यह समाज आक्रांत हुआ है. और कितने दीक्षित हुए थे। और इन्हींके प्रभावसे यहांके ब्राह्मणांके विषम शेलोंसे इसका वक्षस्थल घायल हुआ है। आज हृदयमें कर्मकांडोंके प्रति आस्था कम होती गई । कर्मकांडोंयह कौन जानता है। का आदर कम होने पर ब्राह्मणेतर विधर्मीगण कर्मकांडका वर्तमान ऐतिहासिकगण घोषणा करेंगे कि इस समाज अनादर और निंदा करने लगे। उत्साहके अभावमें और निर्वातस्थानमें अग्निकी तरह साग्निक ब्राह्मणगण निराका जो अधःपतन हुआ है उसका मूल है बौद्ध विप्लव । किन्तु हम कहेंगे कि केवल बौद्धोंसे इस समाजका विशेष ग्निक हो गये । इसी समय उन ब्राह्मणोंकी स्व-सामाजिक अनिष्ट साधित नहीं हुआ है। जिस प्रकार बहु सहस्रवर्षों और धर्मनैतिक अवनतिका सूत्रपात हुआ। उसके बाद पूर्व से इस समाजका अभ्युत्थान हुआ था उसी प्रकार सम्राट अशोककी अनुशासन लिपिमें 'अहिंसाका माहात्म्य बौद्धधर्म प्रचारके पहले ही इनका पतनारम्भ हुश्रा है।। सर्वत्र प्रचारित हुआ और जनसाधारणका मन उससे पहले ये ब्रह्मण वेदमार्ग परिभ्रष्ट नहीं थे और वेदविद् विचलित हुश्रा । यहाँ के अधिकांश ब्राह्मणोंने वैदिकाचारका और साग्निक ब्राह्मण कहे जाते थे। किन्तु यहाँ (वंग) परित्याग किया। जिन्होंने पहले ब्राह्मणधर्म परित्याग नहीं किया वे वैदिकी पूजा विसर्जन कर पौराणिक देवकी जलवायुका ऐसा गुण है कि सब कोई नित्यनूतनके पक्षपाती हैं और पुरातनके साथ नूतनको मिलानेके लिए पूजामें अनुरक्त हो गये । पौराणिक देव पूजाका प्रभाव तत्पर रहते हैं । इस प्रावहवामें पुरातन वैदिक मार्गके बंग वासियों पर हुआ । जिस समय बंगालमें पौराणिक ऊपर भी अभिनव साम्प्रदायिकोंकी भीषण झटिका प्रवाहित देवपूजाका प्रसार हो रहा था उस समय धीरे धीरे उसके हुई थी । उसीके फलसे गौड (वंग) देशमें जैनधर्मादिका अभ्यन्तरमें बौद्धमत प्रवेश कर रहा था । पौराणिक और बौद्धगणोंके संघर्ष में बौद्धधर्मने जय लाभ किया। जैन अभ्युदय हुआ । जब भगवान् शाक्य बुद्ध ने जन्म ग्रहण नहीं किया था उसके पहलेसे ही गौडदेशमें शैव, कोमार, और प्रभृति अन्य प्रबल मत भी क्रमसे उसके अनुवर्ती होने जैनमत प्रवर्तित थे। जैनोंके धर्म-नैतिक इतिहाससे पता. लगे । इसी समय गौड मंडल में तांत्रिकताकी सूचना प्रारम्भ चलता है कि शाक्यबुद्ध से बहुत पहले बंगालमें जैन प्रभाव हुई । वैदिकोंका प्रभाव तो पहिले ही तिरोहित हो चुका विस्तृत हो गया था। जैनोंके चौबीसों तीर्थंकर शाक्यबुद्ध था । अब पौराणिक भी नतमस्तक हो गये। के पूर्ववर्ती हैं और इनमें २१ तीर्थकरोंके साथ बंगालका खुष्टीय ( ईसवी) अष्टम शताब्दिमें गौडमें फिर संस्त्राव है इनमें १२ वें तीर्थंकर वसुपूज्यने भागलपुरके ब्राह्मणधर्मका पुनरभ्युदय हुा । इसी समय गौडेश्वरने निकटवर्ती चम्पापुरीमें जन्म ग्रहण किया और मोक्ष लाभ कान्यकुब्जसे पंच साग्निक ब्राह्मणोंको आमन्त्रण कर किया। और द्वितीयसे १७३१३ वें से २१ वें और २३ वें बुलाया । इसी समय गौडीय ब्राह्मणोंने 'सप्तशती' आख्या श्री पार्श्वनाथ इन २० तीर्थकरोंने मानभूम जिलास्थ सम्मेद- प्राप्तकी। उस समय गौडमें ७०० घर उन प्राचीन शिखर वर्तमान पाश्वनाथ पर्वत पर मुक्त हुए । पार्श्वनाथका ब्राह्मणोंके थे जिनको वेदाधिकार नहीं था। कन्नोजागत पंच निर्वाण ७७७ खुष्ट पूर्वाब्दमें हुआ था । इन्होंने वैदिक ब्राह्मणोंसे ७०० ब्राह्मणोंके पार्थक्य या भिन्नता रखनेके कर्मकाण्ड और पंचाग्निसाधन प्रभृतिकी विशेष निंदा की लिये सप्तशती' आख्याकी सृष्टि हुई । दूसरा अभिमत थी। उस समय वैदिकाचार और पंचाग्निसाधनादि अनेक यह है कि सरस्वती नदीके तीरवासी सारस्वत ब्राह्मण ही कर्मकाण्ड प्रचलित थे । पार्श्वनाथकी जीवनीसे इनका सर्वप्रथम गौडदेशमें आये थे और राढ़ देशके पूर्वांशमें अनेक आभास मिलता है । तीर्थंकरगण कर्मकाण्ड सप्तशतिका ( वर्तमान सातसइका) नामक जनपदमें वास विद्वेषी होने पर भी ब्राह्मण विद्वेषी कोई न थे । सभी करनेके कारण सप्तशती या सातशती नामसे कहे जाने माझवोंकी यथोचित भक्ति श्रद्धा करते थे अब भी जैन लगे । इस सप्तशतिका जनपदका कितना ही अंश अब वर्द्धसमाजमें उसका पालन है। मान जिलेमें सातशतका या सातसइका परगनामें परिणत हो Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.527317
Book TitleAnekant 1953 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1953
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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