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किरण]
संग्रहालय में प्रदर्शित हैं पर उनमेंसे बी २० और सर्प - फरयुक्त पार्श्वनाथ ( १५०५ ) के साथ ही साथ २६८, ४८८ नं० की भी दृष्टव्य हैं।
मथुरा-संग्रहालयकी महत्त्वपूर्ण जैन पुरातत्त्व सामग्री
उत्तरगुप्त और मध्यकालकी कला - जहाँ गुप्तकाल अपनी सरल भावव्यंजना के लिये प्रसिद्ध मध्यका कृत्रिम अलंकरण और सजावटके लिये ध्यान देने योग्य है। इस कालकी बनी मूर्तियों में वह स्वाभाविकता नहीं रही जो गुप्त कालके तक्षकों की छैन निसृत हुई थी।
मथुरा संग्रहालयकी १५०४ नं० की ऋषभनाथकी मूर्ति उत्तरं गुप्त कालकी है । इसका आसन बहुत सुन्दर है और मस्तकपर तीन छत्र तथा पीछे प्रभामंडल है । ऊपर पंच जिन हैं । नं० बी ६६ उत्तरगुप्त कालकी सर्वतोभद्रका प्रतिमा है जिसका उल्लेख पहिलेसे किया जा चुका है।
अन्य मूर्तियोंमें बी ७७ सुन्दर अलंकृत आसन पर ध्यानमुद्रा में स्थित तीर्थकर नेमिनाथकी मूर्ति है । इसकी चौकीपर शंख चिन्ह, ऊपर छत्र तथा पीछे प्रभामंडल हैं। नं० बी ७५ कमलाकार प्रभामंडल और हरिण चिन्ह युक्त शान्तिनाथकी मूर्ति है । बरामदे में रखी २७३८ नं० पद्मासन मूर्ति भी इसी काकी है।
तीर्थङ्कर मूर्तियोंके सिर
जैसा कि पहले लिखा जा चुका है, जैन तीर्थकरोंकी मूर्तियोंके सिर उष्णीषहीन होनेसे बुद्धसिरांसे अलग किये जा सकते हैं। मथुरा संग्रहालयमें इस प्रकारके सिरोंकी संख्या कम नहीं है और वहाँ कुषाण और गुप्त दोनों कालोंके मूर्तिसिर प्रदर्शित हैं ।
षटकोण गृह नं० १ सिरोंका प्रदर्शनगृह है । यहाँ अनेक बुद्ध, बोधिसत्व और हिन्दू देवताओंके सिरोंके साथ ही जन तीर्थङ्करोंके सिर भी दीवारके सहारे एक कतार में सजे हुये हैं। नं० बी ७८ किसी तीर्थङ्करका कुषाण कालीन सिर है, चौड़ा चेहरा
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चपटी नाक और मुंडित मस्तक इसके प्रमाण हैं । नं० बी ४५ गुप्तकालीन सिर है यह उसके घुंघराले बाल. गोल चेहरे आदिसे जाना जा सकता है । नं० बी ५१ में लहरिया केश हैं और भ्रूमध्य में ऊर्णा चिन्ह बना हुआ है ।
सबसे अधिक महत्वका है नं० बी ६१ जो षट्कोण गृह नं० ३ के बीचोबीच चबूतरेपर सजा हुआ है । यह किसी विशाल मूर्तिका सिर है और इसकी ऊँचाई २ फुट ४ इंच है। मूर्तिनिर्माणकलाका यह. अद्वितीय नमूना है । यह गुप्तकालीन है और मथुराके चित्तेदार लाल पत्थरका बना हुआ है।
बाहर बरामदे में भी सिर प्रदर्शित हैं जो कम महत्वके हैं। बी ४४ किसी तीथङ्करका कद्दावर सिर है और बी ६२ तीथङ्कर पाश्वनाथका षट्फण युक्त सिर है जो दृष्टव्य हैं। ये दोनों कुषाणकालीन हैं।
सिरोंकी बनावट के अन्य दो और प्रकार प्रतिमा नं० ४८८ और प्रतिमा नं० २६८ में भी लक्षित किये जब सकते हैं । उपसंहार
इसके अतिरिक्त कंकाली टीलेसे प्राप्त अन्य शिल्प, मिट्टीके खिलौने, वेदीका स्तम्भ, तोरणोंके अंश आदि भी उक्त संग्रहालय में प्रदर्शित हैं । और इस प्रकार मथुरा संग्रहालयने जैन कलाका संरक्षण और वैज्ञानिकरूपेण प्रदर्शन करके जैन समाज भारी उपकार किया है। संग्रहालय के
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क्यूरेटर श्रीकृष्णदत्तवाजपेयी सब क्यूरेटर श्रीचतुर्वेदी अत्यन्त सरलप्रकृति और मिलनसार व्यक्ति हैं । जैन पुरातत्त्वमें आप दोनोंकी विशेष रुचि है और हमारे लिये प्रसन्नताकी बात है ।
अंतमें मैं जैनसमाजके कलापारखियों और पुरातत्त्व प्रेमियोंसे अनुरोध करूंगा कि वे ऐसी योजना बनायें जिससे यहाँ वहाँ बिखरे पुरातत्वकी रक्षा हो सके ।
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