________________
३४२]
अनेकान्त
[वर्षे ६
प्रकाश देनेवाला वह. शायद अपने प्रति अंधकारके । परन्तु एक और है तीसरा चित्र . सिवा किसीकी कल्पना भी नहीं कर पा रहा है।
.. यह ? यह कौन ? जिसे अपनी ही सुध नहीं है, अपने अस्तित्व
____ हाँ, यह आदमी है आदमी। यह न कलाकार है तकसे बेखबर है, क्या ऐसा व्यक्ति दुनियादार हो सकता है ? और जो दुनियादार नहीं है, उस विश्व
न दुनियादार । यह तो वह है जो कलाके पीछे पड़कर वेदनासे व्यथित मानवको दुनियामें रहनेका क्या
. न दुनियासे दूर हटना चाहता है, न कुशलताका अधिकार है ?
आश्रय लेकर दुनियामें रहना चाहता है। यह यशसे
भागता है, पर वह उसके पीछे दौड़ता है। दुनियाको एक दूसरा चित्र
वह छोड़ना चाहता है. वह उसे नहीं छोड़ना चाहती। 'एक लेखक है, जो वक्ता भी है। शरीरसे सुन्दर, इसने विश्वके लिए अपनेको निर्मोही बना लिया है, वाणीमें माधुर्य । आँखोंमें चपलता. कार्यमें कुशलता। पर उसके प्रति मोह बढ़ता जाता है। दुनियादारने पाँवोंमें स्फूर्ति, अँगुलियोंमें चुटकी । कला और साधना पूछा, उत्तर मिला मैं कलाकार हूँ । कलाकारको उत्तर ऋषियोंकी थाथी है, हमें तो चाहिए पैसा। पैसा मिले मिला कि वह दुनियादार है। लेकिन वह स्वयं कहता इसी लिए लिखते हैं। लिखा कि टोली तैयार है, और जानता नहीं कि वह क्या है। बड़ा अजीब अखबारवाले मित्र हैं। व्यवसायी हैं तो विज्ञापनका. मामला है। और साधना? बाजार गर्म है। सभा-सोसाइटी, चाय-पार्टी, मीटिङ्ग- साधना ? साधना क्या ? वह स्वयं नहीं जानता वीटिङ्ग, गप-शपमें उन्हें सबके आगे देखा जा सकता कि उसकी साधना क्या है। उसे अचरज है कि सब है। दिखानेवाले साथ ही जो रहते हैं।
उसके पीछे हाथ धोकर क्यों पड़े हैं। कहता है कि मैं __यों तादात्म्य किसी वस्तुसे नहीं, पर जा बैठे तो कुछ नहीं। किसीका उसे कुछ नहीं चाहिए सब तो सबके ऊपर । पत्रिकाओंने छापा. नेताओंका आशीर्वाद छोड़े दे रहा है । लो यह फेंका, फेंक ही तो दिया। मिला, वाणीकी कुशलताने कानोंको आनन्द दिया, लोगोंने कहा नहीं जी यह पक्का कलाकार है, पूरा रूप और आँखोंकी मोहकताने विश्वास दिलाया और साधक है । देखो न, कैसी सीधी पर चुभने वाली बातें यों मान लिए गये चोटीके कलाकार । नाम बढ़ा, यश करता है ! क्या ऐसा-वैसा दुनियादार इतनी गहरी मिला और धन भी घरमें आने लगा।
कह सकता है। यह जीवनका कलाकार है। - लेकिन ?
.. हाँ, है, होगा। पर ? . लेकिन कौन जानता है भीतर क्या है ! इतना
पर उसके भीतरको कौन जान पाया है ? उसने नाम, यश और धन पल्ले पड़नेपर भी ऐसी कौन-सी
अब तक कहा, सुना तथा समझाया। माना किसीने शक्ति है जो भीतर ही भीतर चोट कर रही है. पीडित
नहीं। क्यों माने ?. . कर रही है। पर दूसरोंको इससे क्या । इसे अपनी सुध है, दूसरोंकी हो तो हो । हीङ्ग लगे न फिटकरी - x रङ्ग चोखा लानेमें कुशल तो वे हैं ही । ऐसे ही चित्र प्रथम ?-दुख, किन्तु स्वयंके लिए सुख । श्रादमी तो होते हैं दुनियादार । हाँ, साहब इन्हें चित्र द्वितीय ?-सुख, किन्तु अन्तमें दुख । ही होता है अभिकार कि वे दुनिया में रहें।
चित्र तृतीय -सुख-दुखकी आँख-मिचौनी।
x
Jain Education Interational
For Personal & Private Use Only
www.lainelibrary.org