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________________ ३७० अनेकान्त [फाल्गुन, वीरनिर्वाण सं०२४६६ पर चढ़नेकी उनको इजाजत नहीं देता है और और न किसीकी खुशामद करने या भक्ति स्तुति करनेमे यहां तक बढ़ जाता है कि धर्मके कामों के करने ही यह काम बन सकता है । बीमारी तो शरीरमें से मल से भी उनको रोक देता है. धर्मका जानने का भी मौका दर होनेसे ही शांत होती है. इस ही प्रकार यह जीवात्मा नहीं देता है। मायाचारके चक्कर में आकर चालाक भी विषय-कषायोंके फन्देसे तब ही छट सकता है जब 'लोगोंने तरह तरह के देवता और तरह तरह की मिथ्या कि कर्मोंका मैल उससे अलग हो जाय और वह शुद्ध धर्म क्रियाओंमें पड़कर भटकते हुये भोले लोगोंको ठगना और पवित्र होकर ज्ञानानन्द चैतन्यस्वरूप ही रह जाय । शुरु कर दिया है। परन्तु यह काम तो जीवात्माके ही करनेका है, किसी ___ यह सब कुछ इस ही कारण होता है कि लोग दूसरेके करनेसे तो कुछ भी नहीं हो सकता है। संसारके मोहमें अन्धे होकर बिना जांचे तोले आँख संसारमें हज़ारों देवी-देवता बताये जा रहे हैं मोचकर ही एक एक बातको मान लेते हैं और झठे जिनकी तरफ़से चारों खंट यह विज्ञापन दिया जाता है बहकावेमें आ जाते हैं। वीर भगवानने लोगोंको इस कि वह सर्व शक्तिमान् हैं, जो चाहे कर सकते हैं, उनको भारी जंजालसे निकालने के वास्ते साफ शब्दोंमें सम- राज़ी करो और अपना काम निकालो । हज़ारों लोग माया कि वह अाँख मीचकर किसी बातको मान लेनेकी इन देवी देवताओं के ठेकेदार बनते हैं, और दावा मूर्खता (मूढ़ता) को त्याग कर, वस्तु स्वभावकी खोज बाँधते हैं कि हमको राज़ी कर लो तो सब कुछ सिद्ध करके नय-प्रमाण के द्वारा हर एक बातको मानकर हो जाय, परन्तु इसके विरुद्ध वीर भगवान्ने यह नाद ख्वामख्वाह ही न डरने लग जावे; इस तरह लोगों के बजाया कि जीव तो अपनी ही करनीसे आप बँधता है मिथ्या अन्धकारको दूर करके और उनके झठे भ्रम और अपनी ही कोशिशसे इस बँधनसे निकल सकता है, को तोड़करके उनको बेखौफ बनाया और अपने आप किसी दूसरेके करनेसे तो कुछ भी नहीं हो सकता है। को कर्मों के फन्देसे छडाकर आज़ाद होने के लिये कमर और इसी कारण इन्द्रादिक देवतात्रोंसे पजित श्री वीर कसना सिखाया । वस्तु स्वभाव ही धर्म है, जबयह भगवानने अपनी बाबत भी यही सुनाया कि मैं भी नाद वीर भगवान ने बजाकर लोगोंको गफलतकी नींद किसीका कुछ बिगाड़ सगर नहीं कर सकता हूँ। इस से जगाया, पदार्थ के गुण बताकर लोगोंका भय हटाया कारण किसी दूसरेका भरोसा छोड़ कर जीवको तो श्राप और सब ही जीवोंमें अपने समान जीव बनाकर अापम अपने ही पैरों पर खड़ा होना चाहिये । कमोंका बन्धन में मैत्री तथा दयाभाव रखनेका पाठ पढ़ाया, और इस तोड़ने के वास्ते आप ही विषय-कपायांसे मुँह मोड़ना प्रकार जगत भर में सुख शांति रहनेका डंका बचाया, चाहिये । विषय कषायोंसे ही कर्मबन्धन होता है और तब ही लोगोंको होश आया । कर्मो के उदयसे ही विषय-कपाय पैदा होते हैं, यह ही वस्तुस्वभाव ही धर्म है, इस गुरु-मंत्रके द्वारा वीर चक्कर चल रहा है, जो अपनी ही हिम्मतसे बन्द किया भगवान् ने लोगोंको समझाया कि विषय कषायोंकी जा सकता है । किन्तु जिस प्रकार पुराना बीमार एक गुलामीसे आज़ाद होना और अपना ज्ञानानन्द असली दम तन्दुरुस्त और शक्तिशाली नहीं हो सकता है, दीर्घ स्वरूप प्राप्त करना ही जीवका परमधर्म है, जिसके लिये काल तक इलाज करते करते आहिस्ता आहिस्ता ही किसीकी खुशामद करते फिरने या प्रार्थनायें करनेसे काम उन्नति करता है, उस ही प्रकार कर्मोका यह पुराना नहीं चल सकता है, किन्तु स्वयम् अपने पैरों पर खडे बन्धन भी साधना करते करते आहिस्ता आहिस्ता ही होने और हिम्मत बाँधनेसे ही काम निकलता है। जिस दूर हो पाता है। ' प्रकार बीमारको अपनी बीमारी दूर करनेके लिये स्वयं इस ही साधनाके लिये वीर भगवानने गहस्थी और ही दवा खानी पड़ती है, स्वयं ही कुपथ्यसे परहेज़ रखना मुनि यह दो दर्जे बताये हैं । जो एकदम रागद्वेष और होता है, किसी दूसरेके करनेसे कुछ नहीं हो सकता है विषय कषायोंको नहीं त्याग सकते हैं उनके लिये गृहस्थ
SR No.527160
Book TitleAnekant 1940 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1940
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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