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________________ अर्हत वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर वर्ष - 23, अंक - 1-2, जनवरी-जून 2011, 49-58 गुप्तकालीन जैन मूर्तिकला* - अभिषेक जैन** सारांश 4थी-6ठी श.ई. के मध्य भारत में राज करने वाले गुप्तवंशी शासक मूलतः ब्राह्मण थे किन्तु धार्मिक दृष्टि से सहिष्णु थे। उनके शासन के पूर्व से ही उनके राज्य क्षेत्र में जैन धर्म समुन्नत था फलतः उनके राज्यकाल में भी वह संवर्द्धित होता रहा। प्रस्तुत आलेख में गुप्तकालीन मूर्तिकला का विवेचन किया गया। कला, अभीष्ट दिव्यता की प्राप्ति का और उसके साथ एकाकार हो जाने का पवित्रतम साधन है। इसी कारण जैनों ने सदैव ललित कलाओं के विभिन्न रूपों और शैलियों को प्रोत्साहन दिया। कलाओं ने धर्म की कठोरता को मृदुल बनाने में सहायता की। जैन धर्म की आत्मा उसकी कला में स्पष्ट प्रतिबिम्बित हुई हैं। यह विविधता पूर्ण व वैभवशाली तो है ही, साथ ही आत्मोसर्ग, शांति एवं समत्व की भावनाओं को भी प्रोत्साहन देती है । एकांत एवं शांत क्षेत्रों में स्थित तीर्थस्थलों पर मूर्तिमान तीर्थकर, प्रतिमाएँ अपनी-अपनी अनंत शांति, वीतरागता और एकाग्रता से भक्त/ तीर्थयात्री को परमात्म तत्व के समीप्य का अनुभव करा देती है। प्रारंभ से ही जैन धर्म मूर्ति पूजा से सम्बद्ध रहा है। तीर्थंकर आध्यात्मिक आदर्श रहे हैं। उनके महान गुणों को मूर्तरूप देने तथा उनके गुणों को अपने में विकसित करने के लिए तीर्थंकरों की मूर्तियाँ बनाना आवश्यक था। जैन मूर्तियों में तीर्थंकरों की मूर्तियाँ ही सर्वाधिक हैं। आरंभ में तीर्थंकर प्रतिमा निर्माण सादगी पूर्ण रहा, किन्तु कालांतर में कला के विकास के साथ तीर्थंकर के चारों ओर अनेक अलंकरण एवं उनके परिकरों आदि का अंकन किया जाने लगा। जैन मूर्तिकला में तीर्थंकरों की मूर्तियों के अतिरिक्त इन्द्र-इन्द्राणी आदि देवगण, तीर्थंकरों के अनुचर, यक्ष-यक्षिणी, नाग-नागिन, देवी सरस्वती, नवग्रह आदि की प्रतिमाएँ मिली है। गुप्काल-चौथी शती ई. के प्रारंभ से छठी शती ई. के मध्य तक गुप्तों के शासन काल में संस्कृति एवं कला का सर्वपक्षीय विकास हुआ। समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय एवं स्कंदगुप्त जैसे पराक्रमी शासकों ने उत्तर भारत को एकसूत्र में बांधे रखा। शांतिपूर्ण वातावरण में व्यवसायों एवं देशव्यापी व्यापार का पुनरुत्थान हुआ और आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई । गुप्त युग में भड़ौच, उज्जैनी, विदिशा, वाराणसी, पाटलिपुत्र, कोशाम्बी, मथुरा आदि व्यापारिक महत्व के प्रमुख नगर स्थल मार्ग से एक दूसरे से सम्बद्ध थे। गुप्त शासक मुख्यतः ब्राह्मण धर्मावलम्बी होते हुए भी अन्य धर्मों के प्रति उदार थे। अभिलेखिय एवं साहित्यिक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि इस युग में जैन धर्म की अधिक उन्नति नहीं हुई। इस काल में जैनधर्म समुन्नत दशा में था। फाह्यान के यात्रा विवरण में भी जैन धर्म का अनुल्लेख है। रामगुप्त के अतिरिक्त अन्य किसी भी गुप्त शासक द्वारा जैन मूर्ति निर्माण का उल्लेख नहीं मिलता है । गुप्त संवत् तिथियों वाली कुछ मूर्तियाँ चन्द्रगुप्त द्वितीय, कुमारगुप्त प्रथम एवं स्कंदगुप्त के समय की है। * Indian Ciceilisation Through Millenia (ICTM)-2009,27-28 फरवरी 2009. मेरठ ** शोध छात्र, कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, 584, महात्मा गाँधी मार्ग, तुकोगंज, इंदौर, निवास : C/o श्री सुरेशचन्द्र जैन, डॉ. छाया शर्मा की गली, दुवे कॉलोनी, गुना (म.प्र.)
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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