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________________ होने वाली प्राचीन तीर्थ जीर्णोद्धार पत्रिका के संपादकीय आलेख, प्रकाशित होने वाले दुर्लभ चित्र इतिहास प्रेमियों के लिये बड़े महत्वपूर्ण हैं। सम्पादकीय आलेखों में तो प्रो. भास्कर का ज्ञान गांभीर्य सतत् दृष्टिगोचर होता है। इसी श्रृंखला में श्री हेमन्त कुमार जैन-जयपुर ने टाईम्स ऑफ इण्डिया (20.04.10) में प्रकाशित एक रिपोर्ट के आधार पर मदुरै में क्षरित होती जैन संस्कृति पर एक टिप्पणी हमें भेजी जो इसी अंक (पृ. 111-112) में प्रकाशित है। इस अंक में प्रकाशित दोनों टिप्पणियां डॉ. चीरंजीलाल बगड़ा की गौवंश संरक्षण पर तथा श्री हेमन्त कुमार जैन की मदुरै में नष्ट होती जैन संस्कृति हमारे लिये चिन्तन की महत्वपूर्ण सामग्री देती हैं। क्या शिक्षित और सम्पन्न जैन समाज का यह कर्तव्य नहीं है कि वह इनमें उठायें गये मुद्दों पर विचार कर त्वरित कार्यवाही करें? जिससे अहिंसा फेडरेशन तो मजबूत हो ही हमारी प्राचीन मूल संस्कृति के दिग्दर्शक नग्न दिगम्बर जिन बिम्बों को समाहित करने वाले फलक, गुफायें भी संरक्षित की जा सके। जैनागम सूचीकरण परियोजना - भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा की गतिविधियों में विगत 2 दशकों में पर्याप्त विविधता आई है। धर्म संरक्षिणी, तीर्थ संरक्षिणी, श्रुत संरक्षिणी, महिला महासभा के बाद इतिहास लेखन हेतु एक स्वतंत्र ट्रस्ट का गठन करने की योजना एवं अब इस श्रुत पंचमी 2011 से अ.भा.दि. जैन श्रुत संवर्द्धनी महासभा द्वारा श्री रतनलाल जैनमती चेरिटेबल ट्रस्ट के साथ मिलकर जैनागम सूचीकरण परियोजना का प्रारंभ करना एक सुखद संयोग है । कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ इंदौर द्वारा 1998 में प्रकाशित जैन साहित्य के सूचीकरण की योजना शुरु की गई थी और उस समय कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ-इंदौर, पार्श्वनाथ विद्यापीठ-वाराणसी, सिद्धकूट चैत्यालय टेम्पल ट्रस्ट-अजमेर, जम्बूद्वीप - हस्तिनापुर एवं अनेकांत ज्ञान मंदिर -बीना के पुस्तकालयों की परिग्रहण पंजियों की डाटा इन्ट्री एक विशेष साफ्टवेयर में कराई गई थी। उस समय लगभग 40,000 पुस्तकों की इन्ट्री कर दिये जाने के बाद अपरिहार्य कारणों से हमें अपना ध्यान जैन पाण्डुलिपियों पर केन्द्रित करना पड़ा और यह योजना नैपथ्य में चली गई। जैन साहित्य की किसी भी विधा पर शोध कार्य करने वाले शोधार्थियों की आज सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि प्रकाशित साहित्य की ही सूचना उसे समुचित रूप से नहीं मिल पाती है तो अप्रकाशित की तो बात ही क्या? इस दृष्टि से श्रुत संवर्द्धनी महासभा द्वारा हस्तगत योजना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मैं इस श्रेष्ठ पहल हेतु महासभाध्यक्ष श्री निर्मल कुमारजी सेठी को बधाई देता हूँ। आदरणीय श्री सी.के.जैन जैसे वरिष्ठ प्रशासक का मार्गदर्शन, सुदीर्घ अनुभव, राजनेताओं से सतत् सम्पर्क इस योजना के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा किन्तु यह योजना अत्यन्त व्यापक एवं जटिल है। भाषा का वैविध्य एक बड़ी अड़चन रहेगी। अनेक भाषा-भाषी समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम, सुव्यवस्थित नेटवर्क, आंकड़ों का विश्लेषण कर आधुनिक तकनीक से उनको संपादित करने में सक्षम केन्द्रीय कार्यालय ही इस योजना को सफलता के शिखर तक पहुंचा सकेगा। सम्पर्क (साधुओं, पत्रिकाओं, विद्वानों, प्रकाशकों, शोध संस्थानों की सूची), दि. जैन तीर्थ निर्देशिका, दि. जैन मन्दिर निर्देशिका के संकलन, संपादन एवं प्रकाशन से हमें इसकी जटिलता का अहसास है तथापि हमारा जो भी सहयोग अपेक्षित होगा, प्रदान कर हमें प्रसन्नता होगी क्योंकि यह संस्कृति संरक्षण का दीर्घगामी, स्तुत्य प्रयास है। क्या ही अच्छा हो इसे एक नहीं अनेक केन्द्रों पर एक साथ चलाया जाये? इससे परिणाम शीघ्र एवं जरूर आयेंगे। जैन पाण्डुलिपियों का सूचीकरण एवं संरक्षण - भगवान महावीर 2600वाँ जन्म कल्याणक महोत्सव के अवसर पर जैन पाण्डुलिपियों की राष्ट्रीय पंजी निर्माण योजना के तहत चयनित 5 नोडल एजेन्सियों ने 2002-03 तथा 2003-04 से 2,50,000 से अधिक पाण्डुलिपियों का सूचीकरण किया किन्तु आज तक यह सूचियां न तो प्रकाशित हुई और न किसी वेबसाईट पर उपलब्ध हुई। अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011
SR No.526589
Book TitleArhat Vachan 2011 01 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2011
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size2 MB
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