________________
प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती शांतिसागर वर्ष प्रसंग क्षुल्लक जिनेन्द्रवर्णी स्मृति व्याख्यान सम्पन्न
माता
20वीं सदी के प्रथमाचार्य, चारित्रचक्रवर्ती आ. शांतिसागर वर्ष
चारिन चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागर वर्ष में कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ द्वारा क्षुल्लक
क्षुल्लक जिनेन्द्रवर्णी स्मृति व्याख्यान जिनेन्द्रवर्णी स्मृति व्याख्यान
इन्दौर, 2.12.2010 02.12.10 को मध्यान्ह में आयोजित किया गया। आचार्य श्री शांतिसागर वर्ष में आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों की श्रृंखला में इस व्याख्यान का शीर्षक रखा गया 'जैन धर्म और मानव कल्याण । प्रो. आर.के. संघवी, विभागाध्यक्षभौतिकी, शास. होलकर विज्ञान प्रो. संघवी अध्यक्षीय संबोधन देते हुए एवं मंचासीन श्री रमेश कासलीवाल महाविद्यालय, इंदौर की अध्यक्षता में आयोजित इस व्याख्यान के मुख्य वक्ता के रूप में राष्ट्रीय प्राकृत अध्ययन एवं संशोधन संस्थान, श्रवणबेलगोला के निदेशक प्रो. प्रेमसुमन जैन पधारे । आपने कहा कि 'जैन धर्म के इतिहास में आदि तीर्थकर भगवान ऋषभदेव ने प्राणी मात्र के कल्याण के लिये असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छः विद्याओं का प्रतिपादन किया। उनके उपदेशों में धर्म, जाति, भाषा, लिंग आदि किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। मानवता हेतु जरूरी शिक्षा, समाज व्यवस्था, राज्य व्यवस्था आदि का सूत्रपात भी उन्होंने किया। पर्यावरण संरक्षण के बारे में जैनाचार्यों के संदेश और विधि-निषेध आज भी इतने ही उपयोगी हैं जितने कि उस समय उपयोगी थे। इस देश को भारत नाम देने वाले भरत और बाहुबली ने युद्ध में भी अहिंसा का ध्यान रखा । उन्होंने 2 सेनाओं में होने वाले युद्ध को टाला। इसके पीछे जो भाव था वह था मानवता का कल्याण, क्योंकि युद्ध में धर्म, जाति और भाषा नहीं देखी जाती। विश्व में युद्ध के इतिहास तो लाखों लोगों के खून से ही लिखे जाते रहे हैं। अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. संघवी ने कहा कि आज भी जैनाचार्य और जैन साधु मानव मात्र के कल्याण के लिए कार्य करते हैं। इतना ही नहीं उनकी तो दृष्टि में छोटा से छोटा जीव भी दया और करुणा का पात्र होता है। यदि हमें विश्व में शांति स्थापित करनी हैं तो जैनाचार्यों द्वारा प्रतिपादित अहिंसक जीवन शैली को अपनाना होगा। इसी में मानव मात्र की भलाई है।
कार्यक्रम में डॉ. सरोज जैन-उदयपुर, डॉ. देवकुमार जैन-रायपुर, डॉ. गोकुल चन्द जैनवाराणसी, डॉ. सुनीता जैन-वाराणसी, डॉ. प्रकाशचंद जैन, डॉ. सुशील सालगिया, डॉ. प्रगति जैन, डॉ. मनीषा जैन, श्रीमती रेखा पतंग्या, श्रीमती उषा पाटनी, श्रीमती समता जैन, डॉ. सरोज कोठारी, श्री सुभाष भाचावत, डॉ. सुरेखा मिश्रा, श्री अरविंद जैन, श्री माणकचंद जैन, श्राविकाश्रम की बहनें एवं उदासीन आश्रम के भैय्याजी आदि उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का सशक्त संचालन वीर निकलंक के यशस्वी एवं क्रांतिकारी सम्पादक श्री रमेश कासलीवाल ने किया। आचार्य श्री के व्यक्तित्व और कृतित्व की जानकारी देने के साथ ही आभार माना संस्था सचिव डॉ. अनुपम जैन ने। अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011
123