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keeping together is progress and working together is success यह अंग्रेजी की एक प्रसिद्ध कहावत है। अतः आईये, हम मिलकर काम करें । हमारे बीच आपसी सम्वाद का होना बेहद महत्वपूर्ण है।
12. देश में आज चार से पांच लाख पशु और करीब पचास लाख से अधिक पक्षी प्रतिदिन मांसाहारियों के पेट में पहुंच जाते है और उन्हें अकाल मरण को प्राप्त होना पड़ता है।
13. वर्ष 2006-07 में जहां देश में कुल मांस उत्पादन मात्र 65 लाख टन का था वहीं वर्ष 201112 के लिए उसका अनुमानित लक्ष्य 105 लाख टन का है। इसी प्रकार अण्डे का उत्पादन इस दौरान 4900 करोड़ से बढ़कर लक्ष्य 7890 करोड़ अण्डों के उत्पादन का है। तय है यह सब पशु हत्या को बढ़ावा देकर ही होने वाला है।
14. आपमें से बहुत से लोग जानते हैं कि हमने अकेले ने 10वीं पंचवर्षीय योजना के मांस संबंधी सात सदस्यीय उपसमिति में सदस्य नामित होकर सरकार की 56 हजार ग्रामीण बूचड़खानों के निर्माण की योजना को सम्पूर्ण निरस्त करवा पाने की ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की थी। फलस्वरूप योजना के उन पांच वर्षों के काल में देश से मांस निर्यात का व्यापार एक निश्चित सीमा तक ठहरा रहा और करोड़ों करोड़ पशुओं को प्रतिवर्ष अप्रत्यक्ष अभय मिला। 11वीं योजना में हमलोग समाज के सहयोग के अभाव में कोई भूमिका नहीं निभा पाये, फलतः इस योजना काल के पहले तीन वर्षों में ही देश से मांस निर्यात का आंकड़ा तीन गुणा वृद्धि को प्राप्त हो गया। यह तथ्य आप सबके सामने ऑन रिकार्ड है। मांस निर्यात का आंकड़ा 17-18 सौ करोड़ से बढ़कर 54 सौ करोड़ के आस-पास पहुंच चुका है।
15. सरकार अभी बारहवीं पंचवर्षीय योजना हेतु समितियों के गठन की प्रक्रिया चालू कर चुकी है। नामों पर विचार चल रहा है। हमें पता चलते ही हमने इस बार पुनः सक्रिय भूमिका निभाने हेतु अपने प्रयास तेज कर दिये। कम से कम 20-25 लाख रुपयों की व्यवस्था करने हेतु हमने संस्था के माध्यम से समाज को सहयोग हेतु निवेदन किया। परंतु दुर्भाग्य है कि लोगों की सोच को देखिये, संस्था को तीन-चार महीने में मात्र पन्द्रह सौ रुपये प्राप्त हुए है और साथ ही दर्जनों पत्र इस अपेक्षा से आये हैं कि हम पूर्व की तरह इस बार भी सरकार पर नवीन बूचड़खानों के निर्माण पर पूरी तरह से रोक लगवा पाने में सफलता प्राप्त करें। इस वर्ष दस माह में हमारी अहिंसा फेडरेशन संस्था को मात्र पैंतालिस हजार रुपयों की प्राप्ति हुई है। हमारे विशाल कार्यालय में हम अकेले ही चपरासी और क्लर्क से लेकर ऊपर तक सबकुछ है। आप सोच सकते हैं कि इन सीमित संसाधनों से क्या किया जा सकता है ? पिछले करीब बीस वर्षों से कमोवेश इन्हीं परिस्थितियों में हम किसी प्रकार कार्य कर रहे हैं। यह है हमारी अहिंसा के लिए, जीवदया के लिए और गौरक्षा के लिए सामाजिक सोच की स्थिति। अब चिन्तन आपको करना है कि आप मात्र टहनियों की देखभाल करना चाहते है या जड़ को भी सुरक्षित करना चाहते है? प्रश्न देशी नस्ल के अस्तित्व को बचाये रखने का है? प्रश्न जीवदया की मूल भावना का है? प्रश्न सह-अस्तित्व के सिद्धांत की रक्षा का है? गेंद अब आपके पाले में है। निर्णय अब आपको करना है कि आप भावनात्मक कार्यशैली चाहते है या प्रोफेशनल कार्यशैली? प्रश्न हमारी भावी पीढ़ी को सुरक्षा देने का है। आचार्य महाप्रज्ञ के शब्दों में -
जीना हो तो पूरा जीना, मरना हो तो पूरा मरना, बहुत बड़ा अभिशाप जगत में, आधा जीना आधा मरना। और अन्त में- यह अंधेरा इसलिए है, खुद अंधेरे में है आप,
आप अपने दिल को एक दीपक बनाकर देखिए। प्राप्त : 10.02.2011
* महामंत्री - अहिंसा फेडरेशन 46, स्ट्राण्ड रोड,तीन तल्ला,
कोलकाता-700007 अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011
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