________________
अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर
टिप्पणी-1 गौवंश संरक्षण - विचारणीय प्रश्न
- चीरंजीलाल बगड़ा*
आचार्य हस्ती अहिंसा पुरस्कार - 2010 के समर्पण अवसर पर जलगांव में 30.01.11 को मुख्य अतिथि के रूप में दिया गया डॉ. चीरंजीलाल बगड़ा का यह उद्बोधन अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं तथ्यात्मक है। पाठक
- सम्पादक
गौवंश हमारी संस्कृति की धुरी है। गाय को हम माता समान आदर देते हैं। फिर भी इस देश में गौवंश की जितनी दयनीय स्थिति है, उतनी अन्यत्र किसी भी देश में नहीं है। किसी भी अन्य पशु की तुलना में इस देश में गौभक्तों की और गौ-प्रेमियों की संख्या कई गुणा अधिक है। फिर भी गौवंश के साथ ऐसा दुर्व्यवहार क्यों और कैसे हो रहा है? इसका हम सबको कारण जानना जरुरी है।
तय है कि प्रमुख कारण तो सरकार की गलत नीतियां हैं। मांस लॉबी, मांस निर्यात लॉबी, चमड़ा लॉबी आदि की सरकारी तंत्र में सांठ-गांठ है। परंतु इसके पीछे हम जीवदया प्रेमियों का भी कम अप्रत्यक्ष हाथ नहीं है। अर्थ केन्द्रित समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है और हिंसा बढ़ती है वहीं धर्म केन्द्रित समाज में नैतिक मूल्यों का विकास होता है और अहिंसा का पल्लवन । आज हिंसा बढ़ रही है, यह समस्या भी है और चिंता का विषय भी।
हम यहां मुख्य रूप से उसी सामाजिक पक्ष को जानने-समझने का प्रयास करेंगे, क्योंकि जो बाते हमारे हाथ में हैं, उसे तो हम तुरंत सुधार कर सही दिशा ले ही सकते हैं।
पहले हम वर्तमान परिस्थितियों पर दृष्टि डालते हैं :
1. भारतीय अर्थव्यवस्था पूर्व में मूलतः कृषि प्रधान थी, अब उसकी भूमिका में तीव्र गति से ह्रास हो रहा है। देश में उद्योग, व्यवसाय और सर्विस सेक्टर, इन क्षेत्रों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है।
2. कृषि में गौवंश की भूमिका में तेजी से कमी आई है। ट्रैक्टर और फर्टिलाइजर ने इनका स्थान ले लिया है। इन दोनों क्षेत्रों में अनुदान का आर्थिक लालच है। जीवदया प्रेमी और गौवंश रक्षा हेतु सहायता देने वाले अधिकांश उद्योगपति ट्रैक्टर और फर्टिलाइजर से जुड़े है। अतः उनका निजी स्वार्थ भी बड़ी रुकावट है।
3. दूध के क्षेत्र में भैंस और जर्सी गायों की बढ़ती हुई भूमिका के कारण देशी गाय का आर्थिक पक्ष बेहद कमजोर हो गया है।
4. देश में सैकड़ों वर्षों से गौशाला की संस्कृति होते हुए भी आज भी देश में आदर्श और आर्थिक स्वावलंबी गौशालाएँ अपवाद रूप में ही हैं जिन्हें हम जनता और सरकार के समक्ष मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सके । गौशाला चलाने वालों की मानसिकता आज भी आर्थिक स्वावलंबन की न होकर मुख्यतः लोगों का भावनात्मक दोहन कर अधिक से अधिक दान एकत्र करने की ही अधिक रहती है। अतः गौमये वसते लक्ष्मी के हमारे उद्घोष के बावजूद भी गाय आर्थिक स्वावलम्बन का प्रतिरूप नहीं बन पाई है, जो दुखद है।
5. प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में गौशाला संस्कृति विद्यमान है। पूर्व में कत्लखाने यांत्रिक नहीं होते थे। वे छोटे-छोटे स्थानीय मांग की पूर्ति हेतु ही होते थे। स्वाधीनता प्राप्त होने तक देश से मांस निर्यात बोल कर कोई व्यापार नहीं होता था। अतः उस समय तक गौशालाओं से गौरक्षण के उद्देश्य की सम्पूर्ति हो जाती थी।
अर्हत् वचन, 23 (1-2),2011
105