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________________ (4) वे नारियाँ, जो संख्या में कम होने पर भी, नारी जगत को कलंकित करती रही हैं एवं (5) आदमी की वह प्रवृत्ति जिसके तहत वह अपना दोष दूसरों पर मढ़ता है, खास कर कमजोरों पर। दलित -पतित नारियों के उत्थान के उदाहरण नारियों की पतित या दलित अवस्था के अत्यन्त मार्मिक चित्रण जैन साहित्य में भी हैं, लेकिन उनसे भी अधिक चित्रण ऐसी नारियों के हैं जो अथक प्रयत्न कौशल से जाग्रत हुईं, उत्थान के शिखर पर स्वयं आसीन हुईं - अपवित्र: पवित्रो वा सुस्थितो दुःस्थितोपि वा, ___धयायेत् पंच - नमस्कारं सर्व-पापैः प्रमुच्यते।" आचार्य जिनसेन द्वरा 783 ईस्वी में लिखित हरिवंश-पुराण' में उल्लेख है कि नारायण कृष्ण के पिता वसुदेव ने म्लेच्छ कन्या जरा से विवाह किया, जिससे उत्पन्न जरत् कुमार ने मुनि बनकर सद्गति प्राप्त की। इसी पुराण' में लिखा है कि राजा मधु ने राजा वीरसेन की पत्नी चन्द्रभा को पटरानी बना लिया और समय आने पर दोनों क्रमश: मुनि और आर्यिका बनकर स्वर्ग सिधारे। 'मृच्छकयिक' या 'मिट्टी की गाड़ी' की प्रसिद्ध कथा की नायिका वेश्यापुत्री वसन्तसेना ने अपने प्रेमी चारुदत्त के साथ श्राविका के व्रत धारण किये, जैसा कि उपर्युक्त 'हरिवंश पुराण'' में लिखा है। इसी पुराण' में और 'बृहत कथाकोश' 11 में उल्लेख है कि घीवर जाति की एक कन्या, पूतिगन्धा ने क्षुल्लिका के व्रत लिये, राजगृह में सिद्धशीला की वन्दना की और समाधि-मरण करके सोलहवें स्वर्ग के अच्युतेन्द्र की देवी हुई। 'बहत कथाकोश' 12 के अनुसार यमपाश नामक चांडाल पर प्रसन्न होकर एक राजा ने उसकी पूजा की और उससे राजकुमारी का विवाह कर दिया। इसी ग्रन्थ के अनुसार जैनाचार्य कार्तिकेय अपनी माता के पिता के पुत्र थे फिर भी मुनि पद के धारक थे। ___ मथुरा में खुदाई से प्राप्त स्तूप, मूर्तियों और आयाग - पटों का निर्माण (तीर्थंकर पार्श्वनाथ के समय से) वेश्याओं और उसके परिवार के सदस्यों तक ने कराया था, जैसा कि उन पर उत्कीर्ण लेखों से ज्ञात है। नारियों द्वारा स्थापित कीर्तिमान प्रकृति ने तो नारी को नर के समकक्ष बनाया ही, उपर्युक्त घोषणा या फतवा ने उसे किन्हीं मानों में नर से ऊपर स्थापित कर दिया। पुराण, इतिहास और पुरातत्व में ऐसे अनेकों उदाहरण है जिनसे सिद्ध होता है कि जैन समाज और राजनीति में नारी को यथोचित, कभी-कभी यथोचित से भी ऊपर स्थान दिया गया या नारी ने अपने प्रयत्न से यथोचित स्थान प्राप्त किया। . कदाचित इसीलिये राम - कथा का, जिस पर जैन साहित्यकारों ने बीसियों काव्य लिखे, वह प्रसंग उल्लेखनीय है जिसमें मन्दोदरी ने रावण को राह पर लाने की कोशिश की। इससे भी अधिक उल्लेखनीय है वह प्रसंग जिसमें वन में छोड़ी जाते समय गर्भवती सीता ने राम से अपने संदेश में कहा – 'आपने लोकापवाद के कारण जिस तरह मुझे छोड़ा है, उसी तरह कभी अपना धर्म नहीं छोड़ बैठना।' जैसा कि सातवीं शती ईस्वी अर्हत् वचन, अप्रैल 99
SR No.526542
Book TitleArhat Vachan 1999 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages92
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size23 MB
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