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अपनी संस्कृति की सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर हमें कार्यक्रमों का चयन करना है। अपने पूर्वजों की दूरदृष्टि और समर्पण की भावना से ही हमें आज अपनी महान सांस्कृतिक धरोहर प्राप्त हुई है। किन्तु वर्तमान में वैसी उत्कंठा देखने को नहीं मिल रही है। सामाजिक संगठनों एवं विद्वत् समुदाय के संगठनों से अपनी प्राथमिकताओं का निर्धारण करते समय उपरोक्त बिन्दुओं को दृष्टिगत रखने का अनुरोध है। धन तो श्रेष्ठी उपलब्ध करायेंगे किन्तु कार्य विद्वानों को ही करना है।
_ मैं अपने सुविज्ञ पाठकों की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा करुंगा क्योंकि उन्होंने सदैव अपनी सक्रियता का परिचय दिया है। अर्हत् वचन के प्रस्तुत अंक के सम्पादन एवं प्रकाशन की प्रक्रिया में सहयोग हेतु मैं दि. जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट के समस्त ट्रस्टियों, विशेषत: श्री देवकुमारसिंह कासलीवाल (अध्यक्ष), संपादक मंडल के सभी सदस्यों, होल्कर विज्ञान महाविद्यालय के गणित विभाग के समी साथियों, विशेषत: विभागाध्यक्ष प्रो. प्रहलाद तिवारी एवं कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ कार्यालय के सभी सहयोगियों विशेषत: श्री अरविन्दकुमार जैन (प्रबन्धक) के प्रति आभार ज्ञापित करता हूँ जिन सबके समग्र सहयोग का प्रतिफल है प्रस्तुत अंक।
अन्त में मैं इस अंक के सम्मानित लेखकों के प्रति भी आभार ज्ञापित करता हूँ जिनके श्रम से ही इस अंक का सृजन हुआ है। 30.4.99
- डॉ. अनुपम जैन
अर्हत् वचन के सम्बन्ध में तथ्य सम्बन्धी घोषणा
(फार्म - 4, नियम -8) प्रकाशन स्थल : इन्दौर प्रकाशन अवधि : त्रैमासिक मुद्रक एवं प्रकाशक : देवकुमारसिंह कासलीवाल राष्ट्रीयता
भारतीय पता
580, महात्मा गांधी मार्ग, इन्दौर - 452 001 मानद् सम्पादक
डॉ. अनुपम जैन राष्ट्रीयता
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584, महात्मा गांधी मार्ग, इन्दौर - 452001 स्वामित्व
कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ (अन्तर्गत - दि. जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट)
584, महात्मा गांधी मार्ग, इन्दौर - 452001 मुद्रण व्यवस्था : सुगन ग्राफिक्स, इन्दौर
__ मैं देवकुमारसिंह कासलीवाल एतद् द्वारा घोषणा करता हूँ कि मेरी अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार उपरोक्त विवरण सत्य है। 30.3.99
देवकुमारसिंह कासलीवाल अध्यक्ष - कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर
अर्हत् वचन, अप्रैल 99