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मंगल आशीर्वचन
परम पूज्य आचार्यों के कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ पुस्तकालय, इन्दौर में
पदार्पण के समय प्रदत्त आशीर्वचन
जैनाचार्य श्री पुष्पदंतसागरजी महाराज
जिनवाणी सरस्वती की उपासना का मन्दिर देखकर मन प्रसन्न हुआ। मैंने अपने जीवन में वृहद् जिनवाणी का मन्दिर देखा। जो मैंने देखा, जो व्यवस्था पाई, जो कार्यकर्ताओं में समर्पण देखा, उससे ऐसा प्रतीत हुआ कि संस्कृति की सुरक्षा
में यदि इस प्रकार का समर्पण नगरों में होता रहा तो पञ्चम काल के अन्तिम समय तक यह यात्रा अक्षुण्ण रूप से चलती रहेगी। अनुपमजी का समर्पण, सहयोग, स्थितत्व अनुकरणीय और अनुमोदनीय है। कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ का उत्तरोत्तर विकास हो, ऐसी मेरी भावना है।
28.11.98
आचार्य पुष्पदन्तसागर
प्रज्ञाश्रमण आचार्य श्री देवनन्दिजी महाराज
भारतीय वाङ्गमय की रचनात्मक सुरक्षा का कार्य कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर में हो रहा है। यह प्रत्यक्ष में अवलोकन करके आत्म संतुष्टि हुई है। शोधार्थियों के लिये सर्वांग रूप से साहित्य को उपलब्ध कराना कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ की विशेषता है।
__ वयोवृद्ध अनुभवी देव शास्त्र गुरु के अनन्य आराधक, समाज शिरोमणि, धर्मानुरागी देवकुमारसिंहजी कासलीवाल के साथ ज्ञानपीठ में धार्मिक चचाएँ व उनका देश, समाज, संस्कृति व ज्ञान के संवर्धन का उत्साह देखकर प्रसन्नता हुई। जैनधर्म के विकास की संभावनाएँ यहाँ निश्चित रूप से उज्जवल हैं। मैं ज्ञानपीठ के संवर्धन की सदैव शुभकामनाएँ रखता हूँ।
शुभाशीर्वाद - 31 दिसम्बर 1998
प्रज्ञाश्रमण आचार्य देवनन्दि
अर्हत् वचन, जनवरी 99
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