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गतिविधियाँ कुन्दकुन्द भारती में खारवेल भवन का शिलान्यास
'खारवेल कलिंग प्रांत का एक महान प्रतापी सम्राट था, जिसने 2200 वर्ष पूर्व देश से विदेशी हमलावरों को भगाकर देश की रक्षा की तथा भारत के सभी राज्यों को एकसूत्र में बांध विशाल कल्याणकारी राज्य की स्थापना की थी। ये शब्द उड़ीसा के मुख्यमंत्री श्री जानकीवल्लभ पटनायक ने कुन्दकुन्द भारती के परिसर में आचार्यश्री विद्यानंदजी महाराज एवं मुनिश्री कनकोज्जनंदि जी महाराज के सानिध्य में आयोजित एक भव्य समारोह में 'खारवेल - भवन का शिलान्यास करने के बाद विशाल जनसभा में कहे।
उन्होंने कहा कि हाथी गुफा के प्राचीन शिलालेख में उसकी विजय पताका का पूरा इतिहास अंकित है। इससे जाहिर है कि उसका शासन कितने बड़े भू-भाग पर फैला था। आंध्र में भी एक शिलालेख मिला है जिसमें खारवेल के प्रतिनिधि शासक का उल्लेख है। इस दिशा में व्यापक खोज की जरुरत है। मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि उड़ीसा सरकार सन् 2000 का वर्ष 'खारवेल - वर्ष' के रूप में मनाएगी और भारत के इस सर्वधर्म समभाव के प्रतीक प्रतापी सम्राट के इतिहास की पूरी जानकारी प्रकाश में लायेगी। खारवेल ने जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की सत्य, अहिंसा संस्कृति को आगे बढ़ाया। जैन धर्म भारतीय संस्कृति का सार - तत्व है। इसे छोड़कर भारत की संस्कृति पर विचार किया ही नहीं जा सकता। मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि खारवेल भवन के निर्माण में राज्य सरकार पूरा सहयोग देगी।।
समारोह के अध्यक्ष साहू रमेशचंद्र जैन ने कहा कि खारवेल की स्मृति में बनने वाला यह भवन भारत के प्राचीन गौरवशाली सांस्कृतिक इतिहास को उजागर करेगा। आचार्यश्री की प्रेरणा से यह एक ऐतिहासिक कार्य हो रहा है। उन्होंने बताया कि 16 से 19 जनवरी 1999 तक भुवनेश्वर में एक संगोष्ठी में विस्तार के साथ खारवेल के संबंध में चर्चा होगी। संपूर्णानन्द संस्कृत विद्यालय के कुलपति डा. मण्डन मिश्र ने इस कार्य को एक ऐतिहासिक प्रसंग बताया और कहा कि आचार्य श्री की प्रेरणा से स्थापित यह भवन कलिंग - संस्कृति का विजय - स्तंभ होगा। उन्होंने कहा कि खारवेल भारतीय संस्कृति के समन्वयकर्ता थे। डा. राजाराम जैन ने सम्राट खारवेल के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि देश का संवैधानिक नाम 'भारतवर्ष' सम्राट खारवेल द्वारा लिखाए गए हाथी गुफा के शिलालेख के आधार पर ही रखा गया है।
आचार्यश्री विद्यानंदजी महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि 'यह भवन सम्राट खारवेल पर शोध का एक प्रमुख केन्द्र बनेगा। खारवेल ने हिमालय से कन्याकुमारी तक तथा कलिंग से गुजरात तक अपना शासन स्थापित किया, कभी भी आततायी नहीं बना। उसने समस्त धन जनता के कल्याण के लिए खर्च किया। इसीलिए क्षेमराज, वृद्धिराज, भिक्षुराज और धम्मराज उसकी उपाधियां थी। खारवेल ने धर्म के शासन की स्थापना की थी। आचार्यश्री ने संस्कृत और प्राकृत भाषाओं के उन्नयन की भी प्रेरणा दी। उन्होंने बारामति के श्रेष्ठि श्री माणिकचन्द उगरचन्द शाह को आशीर्वाद दिया जिन्होंने इस भवन के निर्माण के लिए धन दिया है। मुख्यमंत्री ने उन्हें सम्मानित किया। मुख्यमंत्री को इस अवसर पर श्री कुन्दकुन्द भारती के रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष में सरस्वती की रजत - मूर्ति भेंट की गई। मुख्यमंत्री ने मेघवाहन सम्राट खारवेल के चित्र वाले केलेण्डर का विमोचन किया। सभा के संचालक डा. सुदीप जैन ने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया कि उड़ीसा में प्राकृत - भाषा के विकास के लिए विश्वविद्यालयों में विभाग खोले जाएं। लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के कुलपति डा. वाचस्पति उपाध्याय ने सभी का आभार व्यक्त किया और कहा कि आचार्यश्री की प्रेरणा से शीघ्र ही विद्यापीठ में प्राकृत - भवन का निर्माण शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि हमें अपने वर्तमान को सुरक्षित रखने के लिए अतीत व अनागत को समझना होगा।
साहू रमेशचंद्र जैन से चर्चा में मुख्यमंत्री ने यह आश्वासन दिया कि उड़ीसा में प्राचीन जैन तीर्थ उदयगिरि - खण्डगिरि के दर्शनार्थ आने वाले जैन यात्रियों को कठिनाई न हो और उनके दर्शनों में बाधा न पहुंचे इसके लिए राज्य सरकार शीघ्र व्यवस्था करेगी।
अर्हत् वचन, जनवरी 99