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________________ 15-22 : 'जैन धर्मावलम्बी राढ़ क्षेत्र की सराक जाति', श्री हरिप्रसाद तिवारी एवं श्री नसिंहप्रसाद तिवारी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 23-33 : 'सीमान्त बंगाल की सराक संस्कृति', श्री युधिष्ठिर मांजी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 34 - 48 "जैनधर्म के पृष्ठ - पोषक राजा पुण्ड्र और उनकी राजधानी', श्री हरिप्रसाद तिवारी एवं श्री नृसिंहप्रसाद तिवारी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 56 - 62 : उड़ीसा की सराक संस्कृति', श्री युधिष्ठिर मांजी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 63-74 : 'निर्ग्रन्थ दर्शन और उसका पीठस्थान गिरिब्रज राजगृह के अस्तित्व में ऋग्वेद', श्री हरिप्रसाद तिवारी एवं नृसिंहप्रसाद तिवारी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 75-87 : 'बंगाल सीमान्त पर बसा सराक सम्प्रदाय' श्री श्यामचन्द मुखोपाध्याय, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 88 - 100 : बिहार सीमान्त की प्राचीनतम सराक संस्कृति', श्री युधिष्ठिर मांजी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 101 - 106 : 'भगवान महावीर की सिद्धभूमि और तत्संलग्न अंचल', श्री हरिप्रसाद तिवारी और श्री नृसिंहप्रसाद तिवारी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 107 - 122 'बंगाल में जैन युग की स्मृति', श्री गोपीकृष्ण बसु, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 122 - 130 'तेलकूपी में सराक और ब्राह्मण संस्कृति की मिश्र रूपरेखा', श्री युधिष्ठिर मांजी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 131 - 136 'देउलघाटा के दीवाल चित्र और सराक संस्कृति', श्री युधिष्ठिर मांजी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 137 - 143 'प्राचीनतम सराक संस्कृति का निदर्शन पाड़ा का मन्दिर', श्री युधिष्ठिर मांजी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 144 - 149 'प्राचीन सराक संस्कृति की सुवर्णभूमि पाकविड़रा', श्री युधिष्ठिर मांजी, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 150- 157 'राढ़ भूमि में जैनधर्म और दुर्गापुर', डॉ. त्रिपुरा बसु, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 166 - 174 __ 'बंगाल के जैन पुरातत्व की शोध में पाँच दिन", श्री भंवरलाल नाहटा, तित्थयर, 22 (1), अप्रैल 98, पृ. 158 - 165 'सराक जाति का स्थितिकरण : संस्कृति संवर्द्धक कार्य', डॉ. नीलम जैन, इतिहास रत्न डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल अभिनन्दन ग्रन्थ, जैन विद्या संचयिका, रीवा, 1998, 313 -323 पूज्य उपाध्याय श्री ज्ञानसागरजी महाराज की प्रेरणा से 1994 में सराक बन्धुओं के इतिहास, संस्कृति एवं सराकोत्थान की गतिविधियों को प्रमुखता से प्रकाशित करने एवं जनजाग्रति हेतु एक पत्रिका के प्रकाशन का निश्चय किया गया। सराक गतिविधियों में रूचि रखने वाले बन्धुओं के लिये यह पत्रिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। विगत वर्षों में इसके प्रकाशन स्थलों / नामों में परिवर्तन के कारण शोधार्थी भ्रम में पड़ जाते हैं। हमारे संकलन में उपलब्ध इस पत्रिका के कतिपय अंकों की सूचनायें यहाँ प्रस्तुत है। यदि अन्य अंक भी प्रकाशित हए हैं, तो उनकी सूचना अगले अंक में परिशिष्ट के रूप में दी जायेंगी। अर्हत् वचन, जनवरी 99 . सरा
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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