________________
वर्ष - 11, अंक - 1, जनवरी 99, 29 - 30
अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर
सराक जाति की विशेषताएं
... कस्तूरचंद कासलीवाल*
स्व. डा. कस्तूरचंद कासलीवाल जैन समाज के ऐसे मनीषी विद्वान थे जिन्होंने प्राचीन पांडुलिपियों की खोज, संरक्षण अनुवाद एवं समालोचनात्मक अध्ययन को पूरा जीवन समर्पित कर दिया। राजस्थानी एवं हिन्दी साहित्य, जैन समाज, जैन जातियों एवं तीर्थों के इतिहास पर लिखी आपकी 35 से अधिक मौलिक कृतियों के अतिरिक्त आपने 200 से अधिक लेख लिखे एवं 20 से अधिक
अभिनन्दन। स्मृति ग्रंथों एवं स्मारिकाओं का सम्पादन किया। 8.8.1925 को जन्में डा. कासलीवाल का दुःखद निधन जयपुर में 3.12.98 को हो गया। अर्हत वचन में प्रकाशनार्थ प्राप्त उनका यह अन्तिम लेख उनको श्रद्धांजलि सहित प्रकाशित है।
.सम्पादक
- वर्तमान में बिहार, बंगाल एवं उड़ीसा के सराकों में निम्न विशेषताएं पायी जाती हैं। सभी सराक - 1. शुद्ध शाकाहारी हैं। 2. प्याज, लहसुन आदि अधिकांश व्यक्ति नहीं खाते हैं। 3. अष्ट मूलगुणों का पालन करते हैं। 4. शादी (विवाह) अपने समाज में ही करते हैं। 5. विधवा विवाह एवं विजातीय विवाह का उनमें निषेध है, इस नियम को तोड़ने वालों
को जाति से अलग कर दिया जाता है। 6. काटो, काटा, टुकड़े करो आदि हिंसावाचक शब्दों का प्रयोग वे लोग भोजनशाला में
नहीं करते हैं। 7. वे सरल स्वभावी हैं, तथा अतिथि सत्कार बड़े ही उत्साह से करते हैं। 8. बिना स्नान किये वे भोजन नहीं बनाते और न ही बिना स्नान किये भोजन करते
9. शुद्धता की दृष्टि से वे अपनी जाति के अलावा अन्य किसी को रसोई घर में प्रवेश
नहीं करने देते एवं उनके परिवार के सदस्य भी अशुद्ध कपड़े एवं बिना स्नान किये
रसोई घर में प्रवेश नहीं करते। 10. अपनी जाति के अलावा अन्य किसी को अपने बर्तनों में भोजन कराने पर उन बर्तनों
का उपयोग भोजनशाला में नहीं करते। प्राय: अन्य जातियों को भोजन कराने के लिये
घर में अलग से बर्तन रखे जाते हैं। 11. सराक बंधुओं के पूर्वज 22 अभक्ष्य के त्यागी थे। 12. शौच के कपड़ों से कोई भी वस्तु नहीं छूते। 13. किसी दूसरों के हाथ से बनी दाल, भात, रोटी आज भी नहीं खाते। * अमृत कलश, 867, बरकत कालोनी, टोंक फाटक, जयपुर (राज.)