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________________ भगवान पार्श्वनाथ ने प्राय: इसी क्षेत्र में विहार कर जन जन की आत्माओं में निर्मलता का अहसास कराया था । यद्यपि उनके विहार क्षेत्र के सम्बन्ध में अधिक जानकारी मुझे उपलब्ध नहीं हो सकी तथापि यहाँ यह विचारणीय है कि बिहार प्रान्त का नाम भगवान पार्श्वनाथ के समय क्या था ? इसका उल्लेख मेरे देखने में नहीं आया है। भगवान महावीर के समय सत्ता का केन्द्र राजगृही था व उस समय मगध एक बड़े भूभाग का द्योतक था लेकिन सराक क्षेत्र उसमें सम्मिलित नहीं था। भगवान महावीर के समय कलिंग देश में सम्पूर्ण सराक क्षेत्र सम्मिलित था। बिहार का बिहार नाम भगवान महावीर एवम् प्रायः समकालीन गौतम बुद्ध के विहार होते रहने से पड़ा हुआ इतिहासकार मानते हैं। महाराज बिम्बसार श्रेणिक से पूर्व की स्थिति की जानकारी मुझे प्राप्त नहीं हो सकी। सराक क्षेत्र में जैन समाज के पवित्रतम क्षेत्रों की स्थिति भी पर्याप्त है। सर्वमान्य तीर्थराज सम्मेदशिखर सराक क्षेत्र की उत्तरी सीमा मानी जा सकती है तो जगन्नाथपुरी दक्षिण । यहाँ पूज्य गणेश प्रसादजी वर्णी का यह मत दृष्टव्य है कि मद्रास प्रान्त (अब तमिलनाडु) के गंजम जिला में भी एक ऐसी जाति निवास करती है जिनके आचार, व्यवहार जैनों से मिलते हैं (नयनार जाति) उन्होंने कोटिशिला की उपस्थिति इसी स्थान पर बताई है। जैनियों के बीस तीर्थंकरों की पावन निर्वाण भूमि सराक क्षेत्र में सम्मेदशिखर के रूप में स्थित है। अन्य चार तीर्थंकरों में से 2 भगवान वासुपूज्य चम्पापुर से व भगवान महावीर पावापुरी से मोक्ष गये हैं। ये दोनों बिहार में ही हैं। कोटिशिला की स्थिति की जानकारी नहीं हुई है। यद्यपि इस सम्बन्ध में जो मत हैं वे इसे सराक क्षेत्र में मानते हैं। डा. बलभद्र जैन ने कोटिशिला को विभिन्न पुरातत्ववेत्ताओं के निष्कर्षों के आधार पर खण्डगिरि - उदयगिरि पर्वत पर कुमारी पर्वत के रूप में पहचाने जाने के लिए अपना मत दिया है। भगवान महावीर के केवल ज्ञान के स्थान की भी पहचान अभी बाकी है। यद्यपि आचार्य भद्रबाहु ने भगवान महावीर के जीवन की घटनाओं को 300 वर्ष पश्चात ही लिपिबद्ध कर दिया था। जैन भवन कलकत्ता से प्रकाशित पत्रिका तित्थयर' में श्री हरि प्रसाद तिवारी एवम् नृसिंह प्रसाद तिवारी के एक लेख में अत्यन्त विद्वत्तापूर्ण ढंग से इस स्थल को खोजने का प्रयास किया है। कल्पसूत्र के लेखक आ. भद्रबाहु स्वामी ने अत्यन्त स्पष्ट लिखा है जंभियगामस्स नगरस्स वहिया उजवालियाए नई तीरे...... वियावओस्स चेइयस्य अदूर सामन्ते सामागस्स गाहावइस्य कट्ट करणंसि साल पायवस्स अर्थात जंभिय गाव के नगर के बाहर उजुवल्ली नदी के किनारे शालवृक्ष के नीचे उजवालियाए शब्द की पश्चात कालीन टीकाकारों ने ऋजुकूला लिखा है। लेखक द्वय ने इसे ऋजुपाजिका कहा है। इसे उज्जवला क्यों नहीं कहा ? स्वामी भद्रबाहु ने भगवान की निर्वाणस्थली की इतनी स्पष्ट रूपरेखा दी है कि अनुमान लगाने के लिए स्थान नहीं है। जमीन के स्वामी का नाम, नदी का नाम, गाँव का नाम और मंदिर (वियावओं चैत्य) का नाम भी जिसके समीप यह घटना हुई। फिर भी हम उस स्थान को पहचान नहीं पा रहे है । तित्थयर के एक अन्य लेख में लेखक द्वय ने भगवान के केवल्य स्थान को, वर्तमान में प्रवाहित अजयनदी जहाँ बिहार से बंगाल में प्रवेश करती है वहां पर चिचुरविल नामक एक दूसरे से 3 मील की दूरी पर दो गांव है। यहाँ एक ही नाम के दो ग्राम हैं। ऋजुपालिका नदी के प्रवाह से उत्पन्न घाटियों को बिल कहा है और ये बिल ऋजुरबिल कहे है ऋजुरबिल का यह क्रमशः वर्तमान रूप चिजुरबिल एवं पुनः परिवर्तित चिचुरबिल है। लेखकों का कहना यह भी है कि ई. सन् 1174-76 में गोविन्दपाल व उसके ही वंशज गोविन्दपाल ने अर्हत् वचन, जनवरी 99 11
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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