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जाप करके दिवंगत आत्मा की शीघ्र मुक्ति एवं शोक संतप्त परिवार के धैर्य की कामना की गई। इसी अवसर पर एक शोक प्रस्ताव भी पारित किया गया।
अक्टूबर 1988 में अर्हत् वचन के प्रवेशांक (वर्ष - 1, अंक 1, सितम्बर 1988) का आपने श्री देवकुमारसिंह कासलीवाल के साथ तत्कालीन उपराष्ट्रपति महामहिम डॉ. शंकरदयालजी शर्मा से दिल्ली में विमोचन कराया था, वे इसके आजीवन सदस्य भी थे।
साहूजी कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ में
1995-96 में आपने कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ हेतु एक विस्तृत परियोजना की स्वीकृति हेतु भी प्रस्ताव किया था। जैन धर्म / दर्शन के वैज्ञानिक पक्ष के प्रस्तुतीकरण की कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ की प्राथमिकता के वे प्रबल पोषक थे। मई 1995 एवं अक्टूबर 95 में आप कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ में स्वयं पधारे एवं अर्हत् वचन की 10 वर्षीय विकास यात्रा में वे सतत हमारे सहयोगी रहे। मई 95 में कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ में आगमन के समय आगंतुक पंजी पर लिखा गया उनका अभिमत हमारी अमूल्य सम्पत्ति है। ( अगले पृष्ठ पर देखें)
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अक्टूबर 95 में वे श्री देवकुमारसिंह कासलीवाल अमृत महोत्सव में आप प्रमुख अतिथि थे। इस कार्यक्रम में साहूजी ने श्री कासलीवालजी के नेतृत्व की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि श्री (देवकुमारसिंह) कासलीवाल द्वारा समाज, शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र में किये गये उनके कार्य तो अभिनन्दनीय हैं हीं, तीर्थों के लिये भी उन्होंने जो कार्य किये हैं वे सदा उनकी याद दिलाते रहेंगे। विशेषकर बद्रीनाथ तीर्थ में अष्टापद की स्थापना उनके शुभप्रयासों का सुफल है।
अमृत महोत्सव में काकासाहब को तिलक लगाते हुए साहूजी
अमृत महोत्सव स्मारिका हेतु अपने संदेश में आपने लिखा कि धर्म के प्रति निष्ठा और आचरण की पवित्रता के साथ श्री देवकुमारसिंह की एक विशिष्टता यह है कि लक्ष्मी और सरस्वती दोनों के प्रिय भाजन है। साहित्य की अभिवृद्धि के लिये उन्होंने कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ की स्थापना की है और वहाँ से अर्हत् वचन के नाम से प्रकाशित त्रैमासिक शोध पत्रिका में उन अनेक जैनाचार्यों व शोध विषयों का उल्लेख होता है जो साहित्य के क्षेत्र में जैन संस्कृति के गौरवपूर्ण अभिदान को व्यक्त करते हैं। उनका यह अत्यन्त सराहनीय कार्य है।
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