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________________ के प्रति विशेष कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहूँगा जिन्होंने निस्पृह भाव से अत्यन्त रूचिपूर्वक बहुत सी सामग्री एवं दुर्लभ चित्र उपलब्ध कराकर मेरा काम आसान किया। 8 दिसम्बर 98 को तिजाराजी में उपाध्याय श्री ज्ञानसागरजी ने इस विशेषांक के प्रकाशन हेतु अपना मंगल आशीर्वचन एवं साक्षात्कार प्रदान कर जो महती अनुकम्पा की है उस हेतु सम्पादक मंडल उनके प्रति विनयावनत है। न केवल इस अंक अपितु अर्हत् वचन के आगामी अंकों हेतु भी हमें उनका परोक्ष आशीर्वचन सदैव उपलब्ध रहेगा यही कामना है। अर्हत् वचन के प्रस्तुत अंक के सम्पादन के निमित्त से मुझे सराक जाति एवं सराक क्षेत्र के बारे में अधिक पढ़ने का अवसर मिला। मैंने अब तक प्रकाशित साहित्य को सूचीबद्ध करने का प्रयास इसी भाव से किया है कि जो बन्धु पढ़ना चाहें, उन्हें क्या- क्या छपा है ? इसकी पूरी जानकारी मिल सके। मेरे विचार से धार्मिक पत्र पत्रिकाओं की सीमा से बाहर निकल कर बिहार, बंगाल, उड़ीसा की जनजातियों की पृष्ठभूमि, उनके पूर्व इतिहास, विकास एवं पराभव के कारणों, धार्मिक मान्यताओं, इस क्षेत्र के विस्तृत पुरातात्विक सर्वेक्षण, तकनीकी छायांकन, अभिलेखीकरण, मूल्यांकन, विस्तृत जनगणना, सामाजिक, आर्थिक स्थिति के विश्लेषण एवं समग्र सामुदायिक विकास की योजनाओं के निर्माण की आवश्यकता है। सम्पूर्ण परियोजना को वि. वि. अनुदान आयोग अथवा समान प्रकार की शासकीय संस्थाओं, निजी ट्रस्टों के सहयोग से अकादमिक तटस्थता बरतते हुए मानकीकृत रूप में 3-5 वर्षों की अवधि में संचालित किया जाना चाहिये, जिससे इनकी मूल संस्कृति, सभ्यता को सुरक्षित रखते हुए उन्हें समाज की मुख्य धारा में जोड़ने हेतु ठोस आधार बनाया जा सके। सराक विषयक प्रकाशनों का मानकीकरण भी एक तात्कालिक आवश्यकता है। अर्हत् वचन का प्रस्तुत अंक महज एक शुरुआत है। नवीन सम्पर्कों, प्राप्त सामग्री एवं प्रदीप्त अभिरूचि के कारण यदि संभव हुआ तो भविष्य में सराक क्षेत्रों का प्रत्यक्ष भ्रमण कर / कराकर अधिक मौलिक / शोधपूर्ण सामग्री सहित एक ओर विशेषांक प्रकाशित किया जा सकेगा। मुझे यह स्वीकर करने में कोई संकोच नहीं है कि इस अंक में संकलित सराक विषयक सामग्री से शोध जगत के ज्ञान में कोई नई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है क्योंकि एतद्विषयक इस अंक में प्रकाशित सामग्री सर्वेक्षणात्मक प्रकृति की है किन्तु यदि शोधकार्य से सीधे जुड़े विद्वानों में इस अंक में प्रकाशित सामग्री रूचि जाग्रत कर सकी एवं उनके भावी अध्ययन हेतु आधारभूत सामग्री उपलब्ध करा सकी तो मैं प्रयास को सार्थक समझँगा । अन्त में मैं दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट के सभी ट्रस्टियों एवं कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ कार्यपरिषद के सभी सदस्यों के प्रति आभार ज्ञापित करता हूँ जिनके आर्थिक संरक्षण से ही पत्रिका का सतत प्रकाशन संभव हो रहा है। मैं नवगठित निदेशक मण्डल, सम्पादक मण्डल, माननीय लेखकों एवं ज्ञानपीठ कार्यालय के अपने सभी सहयोगियों को भी धन्यवाद देना चाहूँगा जिनका समर्पण भाव ही ज्ञानपीठ एवं अर्हत् वचन की मुख्य शक्ति है। होल्कर स्वशासी विज्ञान महाविद्यालय के प्राचार्य एवं का परोक्ष सहयोग अविस्मरणीय है क्योंकि उसके बिना इन असंभव है। गणित विभाग के सभी सहयोगी प्राध्यापकों अकादमिक कार्यों हेतु समय निकाल पाना सुन्दर, आकर्षक मुद्रण हेतु सुगन ग्राफिक्स तथा प्रोत्साहन हेतु सुधी पाठक भी बधाई के पात्र डॉ. अनुपम जैन 14.1.99 अर्हत् वचन जनवरी 99
SR No.526541
Book TitleArhat Vachan 1999 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size8 MB
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