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________________ 4 . 110.39-12-32 मामले भारतीय पोरवाल दर आदमी अपनी असली स्थिति में कायम रहता था। दर असल देखा जाय तो असली स्वामीवत्सत्यता का मतलब इसी સમાજસે અપીલ. में है और वे इसी में अपनी जाति धर्मका गौरव समजतेये। उपति और अवनतिका प्रवाह सदाकाल बहता ही रहता है इसी नियम के अनुसार आज पोरवाल जाति मणानि सिरोही में ता. 6-12-32 को उत्साही सजनोंकी "मुख हो रही है और जगद 2 क्लेश और देषसे परीपुर्ण है मीटिंग हुई जिसमें सर्व सम्मति से अखिल भारतवर्षीय पोरवाल इन सबको दूर करने के लिये और जातिको ठीक रास्तेपर लानेके महा सम्मेलन की अपील जैन वर्तमानपत्र में भेजनेका निश्चय लिए हम सबको तन, मन, धन, से तैयार होकर कार्यक्षेत्रमें हुआ। कार्य कारिणी कमेटी के मेसोउन्ट शेढ भभुतमलजी उत्तरजाना चाहिए ताकि हम अपनी जातिको संसारकी और चतराजी देलदर निवासी शेठ भीमाजी मोतीजी (जन्याई वाले) जातियों के साथ उन्नतिका पुदीड में सामिल रखसके इसके शाह एस. आर. सीधी जनरल सेक्रेटरी बीजेराजजी सीधी व लिये एक सम्मेलन करनेके सिवाय दुसरा कोई उपाय कि पुनमचन्दजी बहितरा, पुनमचन्दजी ईसराजजी सीधी ट्रेजरर लहाल नजर नहीं आता। अतएवं मेरा इरादा यह है कि मुकरर किये गये और पन्दर महाशयोंकी- एक कमेटी बामण बाडती में चैत्र महीने में लियांके मौके पर सम्मेलन बनाई गई। के लिये विचार कियाज्ञाय और वहाँपर इसकी रूपरेखा तैयार संघ सम्मनों की जयजिनके पथात् निवेदन है कि कर अखिल भारत वर्षीय सम्मेलन किसी खास जगहपर जो पोरवाल (भागक्ट) जाति जोकि किसीसमय भारत में पुर्ण उमति सबको अनुकूल होगी तय किया जायगा ! अतय आप कृपा के शिवरपर पहुँचीथी और जिसके हाथ भारतका आधेसे कर अपनी योग सम्मति इस विषयपर प्रदान कर और अपने जियादा बागिय था और जिसके जहात भारतके वाहिर केम्बसे आसपास के गांयौके पोरवाल कार्यकत्ती और उत्साही सद्देश देशान्तरको भाते और जातेथे। आज उस जातिका दिनों गृहस्थों के नाम व गोत्र व मनुष्य संख्या घरकी संस्था दिन पतन हो रहा है यदि इसका उपाय-शीन न कियागया नीचे के कोटक में भरकर भेजे ताकि जहाँ 2 पर पोरवालों के तो यह जाति भारत में 50 वर्षों से अधिक नहीं जा सकती घर हो यहाँ 2 उनको साहित्य या पत्रिकाएँ भेजने में पूर्ण एक समय यहथा जब इस जातिका दीर-दीरा भारतमें ही सुभीता रहे। आपका उत्सर व सम्मति आनेपर आन्दोलन नया परमा सारे संसार में था जिस जातिकी कीर्तिका उजवल पत्रिकाओं द्वारा किया जायगा। इतिहास अबतक आबु, देलवाडा के अनुपम जिनालय और भवदीय, . . सिरोही व राणकपुरके जैन मन्दिर बता रहे है। सीधी शाह समर्थमल, रत्नचन्दनी वकील. इस जाति में सबसे पविया भाव जो स्वामीवरसत्यताका . जनरक सेकेसी, अखिल भारत वर्षीय पारवाल महासम्मेलन, था यह सर्वधा लोप होगया है। उस भावके डोप हो जानेसे मु. पो. सिरोही (राजपूताना) आज जातिची हीन अवस्था हो रही है। आपको इतिहाससे यह बात विदित ही है कि एक ही चंडावती नगरी में जो વિદ્વાનેને ખુશ ખબર. वर्तमान आयुरोट से चार मील दक्षिणामें थी और जहांपर (न्यायनी अथ) पारवालों के हजारों पर थे और उनमें संगठन होनेकी बद स लामा समस्या 24aa खी ती भने से सब करोगाचीपति थे और सारे शहरका साना एक सजानता . मग मी0 मन मुनिपसिना vyavel (पोरघास) के घरचारी 2 से होता था! वहाँ वहांतक स्वामी भि-पा अवमामा, म नोभा छ, यसत्यता का हिसाब था कि यदि किसीको प्यापार में हाना ते पायी हिताय अंथ "प्रमाणनयत-त्वालोक (प्रमाण-कहो जाती, जहाज युवजाता था और किसी वजहसे नुकसान तथा 42) ने पापा पुरव२ विद्वान काहि हो जाता तो वहां की पंचायतका यह नियम था कि वे एक सलिलाव सं 2 मामा-भी 2 लाख रुपया घरपति दे देते थे और जिस वहभी करोडा- तनी कि सीधे समयमा अना२ 57. धीपति हो जाताधा और इसी तरह हरएक को सहायता: वेनेसे अपने पाय-व्यतीर्थ र भनिराश्री निभा મહારાજથી આ માના સ્વમતિથી જ થયેલા છે નહિ ને વિયજીએ એડીટ કરે છે અને જેમાં નોટ, પાઠાંતર, અનુની ૫ણુ વણીથી, શા માગૅના ઉત્તરની રાઠ તા 15-20 ક્રમણિકા મલ્ટિ આપી પ્રસ્તાવનામાં પ્રય, પ્રયકાર અને જન 2 સુધી ન મળે તે માટે મારી શક્તિ મલ્મ પ્રયત્ન ન્યાયના જિમમાં મારો પ્રકાશ પામે છે. અાવીસ રતલી સુંદર કરવા પડે મા પ્રશ્નોના ઉત્તરે મને 15-12-2 ધી કાગળમાં, કાન સેપેઝ સાઈઝમાં લગભગ સવકસે છાના મળી તો મારા બીજા પ્રશ્ન પણ્ હું પૂછી શકીશ મટે આ દાર એ થની કિંમત માત્ર ફા. -14- ચાદશાના છે. पोटे- 244 પ્રશ્નોના ઉત્તર જરૂર ના 15-12-30 સુધીમાં મોકલાવૌજી. भानु :ભી* કાચા અજુઓને ઉપાસકે, ગેસ એ. એમ. એ.) શ્રીવિજયધમ મૂઝિથમાળા કાંતિલાલ ભોગીલાલ શાહની छोटा 22 1000 पा२ 5 / 2019. (2004) ... Garda (माmril) Printed by Lali Harsey Lalan at Mahendra Printing Press, Gaya Building Masjid Bunder Rond Bombay, 3 and Published by Shivlal Jhaverchand Sanghvi for ___Jain Yuvak Sangh.at-28-30, Dhanji Street Bombay, 3.
SR No.525793
Book TitlePrabuddha Jivan - Prabuddha Jain 1932 12 Year 02 Ank 06 to 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandrakant V Sutaria
PublisherMumbai Jain Yuvak Sangh
Publication Year1932
Total Pages42
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Prabuddha Jivan, & India
File Size4 MB
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