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संपादकीय
रामप्रकाश झा श्रुतसागर का यह नूतन अंक आपके करकमलों में सादर समर्पित करते हुए अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है।
इस अंक में गुरुवाणी शीर्षक के अन्तर्गत योगनिष्ठ आचार्यदेव श्रीमदबुद्धिसागरसूरीश्वरजी म. सा. का लेख “पूजा हेतु” के आगे का अंश प्रकाशित किया जा रहा है। इस लेख में जिनेश्वर वीतराग प्रभु के दर्शन से प्राप्त होनेवाले लाभों का वर्णन किया गया है, द्वितीय लेख राष्ट्रसंत आचार्य भगवंत श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. के प्रवचनांशों की पुस्तक 'Beyond Doubt' से क्रमबद्ध श्रेणी के अंतर्गत संकलित किया गया है। __अप्रकाशित कृति प्रकाशन स्तंभ के अन्तर्गत इस अंक में दो कृतियों का प्रकाशन किया जा रहा है। प्रथम कति गणिवर्य श्री सुयशचन्द्रविजयजी म. सा. द्वारा संपादित “भादमन्त्री रास” है, जो अद्यावधि सम्भवतः अप्रकाशित व अज्ञात है। इस कृति में मन्त्री भाददेव के माहात्म्य का वर्णन किया गया है। द्वितीय कृति आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमन्दिर के वरिष्ठ पंडितवर्य श्री संजयकुमार झा के द्वारा सम्पादित एवं तपागच्छाधिपति आचार्य विजयप्रभसूरि के परम्परावर्ती महिमाविजय के शिष्य लालविजय के द्वारा रचित “अंकपल्लवीबद्ध पार्श्वजिन स्तवन” है। इस कृति की विशिष्टता है कि इसमें मात्र अंकों का प्रयोग करते हुए सम्पूर्ण कृति की रचना की गई है। अनुमानतः वि.सं. 18वीं के मध्यकाल में रचित यह लघुकाय कृति सम्भवतः अप्रकाशित है।
अन्य विशिष्ट प्रकाशनस्तंभके अंतर्गत इस अंक में कवि धनपालरचित "ऋषभपंचाशिका" की कुछ गाथाओं का प्रकाशन ब्राह्मीलिपि में किया जा रहा है। इस कृति का लिप्यंतरण कार्य श्री किरीटभाई के. शाह द्वारा किया गया है। आशा है ब्राह्मी लिपि के अभ्यासुओं हेतु यह उपयोगी सिद्ध होगा। उसके बाद डॉ. उत्तम सिंह के द्वारा रचित व सम्पादित पुस्तक भारतीय पुरालिपि मञ्जषा की समीक्षा डॉ. कृपाशंकर शर्मा के द्वारा प्रस्तुत की गई है।
पुनःप्रकाशन श्रेणी के अन्तर्गत इस अंक में मुनि श्री धुरंधरविजयजी द्वारा लिखित लेख “जैन न्यायनो विकास” का अन्तिम अंश प्रकाशित किया जा रहा है. इसमें जैन दार्शनिक ग्रन्थकारों में से श्री रामचन्द्रसूरि, श्री गुणचन्द्रसूरि, श्री प्रद्युम्नसूरि व श्री रत्नप्रभसूरि के समय व उनके कृतित्व का संक्षिप्त परिचय दिया गया है।
__ आशा है, इस अंक में संकलित सामग्रियों के द्वारा हमारे वाचक लाभान्वित होंगे व अपने महत्त्वपूर्ण सुझावों से अवगत कराने की कृपा करेंगे, जिससे अगले अंक को और भी परिष्कृत किया जा सके।
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