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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra श्रुतसागर www.kobatirth.org 12 दश ब्रह्मचर्य समाधिस्थान कुलक ॥ श्री जिनाय नमः ॥ ॥ ६० ॥ श्री नेमीश्वर पाय नमी, पामी सुगुरु पसाउ । मन उल्लासई संथुणउ, परम ब्रह्मव्रतरीव' ॥१॥ ब्रह्मचर्यना गुण घणा, रयण जेम जगि सार । सुरगुरुजीभई कह, तउ पुण न लहइ पार ॥२॥ तरुणपणई' जे तारुआ', ते विरला संसारि । खुता नारि' नदी जलिइं, ते किम पुहुचई पार ॥३॥ शिवगामी तेणइ ज भवि, स्वामी मल्लि नेमि । भचेर मनि थिरकर, मुकति पहुता खेमि ॥४॥ जीव विमासी' जोइतउं, जीवन खिण-खिण जाइ । अंजलिना जलनी परइं, तिम करि जिम थिर थाइ ॥ ५॥ गुरु आराम' जोइ, जिनप्रवचन आरा 1 मनथाई तरु रोपियउ, बंभचेर अभिराम ॥६॥ श्रद्धा सारण जल विमल, वहइ तिहां सुविवेक । सुदृढमूल समकित भलउ, गुणगण पत्र अनेक ॥७॥ पंचमहाव्रत'विडिम' सम, तत्त्वविगति तसु खंध । तेनी शाखा भावना, मउर जि (जे) शुभनउं बंध ॥ ८ ॥ उत्तम सुरसुख तसु कुस (सु)म, मुगति ति फल अतिचं 1 महावृक्ष ते राखिवा, हियडइ अविहड रंग ॥ ९ ॥ ॥ ढाल ॥ उत्तराध्ययनि बोल्या सोलमइंजी, बंभ समाहीठाण । कीधा उत्तम तरुवर पाखलिइंजी, ए दश वाडि समाण ॥ १० ॥ Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir भवियण भावइं निरतउ पालिइंजी, व्रतमांहि गुरुअउ बंभ । दंभ कदाग्रह दूर परहरी जी, नरभव लहिय दुर्लभ ॥ ११॥ ( आंचली) स्त्री पसु (शु) पंडक वसतिइं जिणइ वसइजी, तिह न करेवउ वास । इहनी संगति भलीय न जाणियइंजी, व्रतनउं करय विणा ॥ १२ ॥ For Private and Personal Use Only अगस्त २०१४ 1. राजा. 2. यौवनवय, 3. तरी जनारा, 4. विचारी, 5. माळी, 6. बगीचो, 7. वृक्ष (?) 8. मोर. भवियण भावई...
SR No.525292
Book TitleShrutsagar 2014 08 Volume 01 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanubhai L Shah
PublisherAcharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
Publication Year2014
Total Pages36
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Shrutsagar, & India
File Size6 MB
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