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________________ संस्कृत छाया : अत्यद्भुतगुणनिकरा किं न श्रुता सकललोकविख्याता । विद्याधरदुहितुर्दुहिता सुरसुन्दरी भद्रे ! ? ।। २१४।। गुजराती अनुवाद : हे भद्रे ! विशिष्ट गुण समुदाय थी युक्त सकललोकमां प्रख्यात तथा विद्याधर नर पुत्री नी पुत्री स्वी आ सुरसुंदरी कन्याने शुं तुं नथी जाणती? हिन्दी अनुवाद : हे भद्रे ! विशिष्ट गुणसमूह से युक्त पूरे विश्व में प्रसिद्ध तथा विद्याधर की पुत्री की पुत्री ऐसी सुरसुन्दरी कन्या को तूं क्या नहीं जानती हो ? गाहा : एवं तीए वयणं सोऊणं हरिस बाह- पुण्णच्छी । गहिऊण मम कंठ पियंवया भणिउमाढत्ता ।। २१५ । । संस्कृत छाया : एवं तस्या वचनं श्रुत्वा हर्षबाष्पपूर्णाक्षी । गृहीत्वा मम कण्ठे प्रियंवदा भणितुमारब्धा ।। २१५।। गुजराती अनुवाद : आ प्रमाणे तेणीना वचन सांभळीने हर्षाश्रुंथी पूर्ण नेत्रवाळी प्रियंवदा मारा गळे वळगी ने कहेवा लागी ! हिन्दी अनुवाद : इस प्रकार उसका वचन सुनकर खुशी के आँसुओं से पूर्ण नेत्रवाली प्रियंवदा मेरे गले लगकर कहने लगी । गाहा : अंबा मज्झ पुव्विं वज्जरियं आसि, मज्झ लहु- भगिणी । भूमिचर - मित्तस्स उ रन्नो मह भाउणा दिन्ना ।। २१६।। संस्कृत छाया : अम्बया मम पूर्वं कथितमासीत्, मम लघुभगिनी 1 भूमिचरमित्रस्य तु राज्ञो मम भ्रात्रा दत्ता ।। २१६ ।।
SR No.525096
Book TitleSramana 2016 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreeprakash Pandey, Rahulkumar Singh, Omprakash Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2016
Total Pages186
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size14 MB
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