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________________ श्रमण, वर्ष ६०, अंक १ जनवरी-मार्च २००९ भगवतीसूत्र में वर्णित परमाणु विज्ञान ओम प्रकाश सिंह द्वादशांगी में भगवतीसूत्र का पाँचवां स्थान है। यह गम्भीर विषयों की चर्चा इस आगम में विद्यमान है। जिस आगम प्रश्नोत्तर शैली में लिखा हुआ है। प्रश्नोत्तर की संख्या प्रकार वेदों में वर्तमान के अनेक जटिल विषयों के आदिसूत्र के विषय में आचार्यों के बीच मतभेद है। समवायांगसूत्र और खोजे जाते हैं उसी प्रकार भगवतीसूत्र में परमाणु विज्ञान, शरीर नन्दीसूत्र के अनुसार भगवतीसूत्र में ३६००० प्रश्नों का व्याकरण विज्ञान, औषधि विज्ञान आदि के अनेक आधारभूत सिद्धान्त है तो दिगम्बर परम्परा के आचार्य अकलंक, आचार्य पुष्पदन्त, खोजे जा सकते हैं। आचार्य भूतबलि तथा आचार्य गुणधर के अनुसार व्याख्याप्रज्ञप्ति परमाणु विज्ञान में ६०००० प्रश्नों का व्याकरण है। आज के वैज्ञानिक अणु के सम्बन्ध में अन्वेषण करने ___अन्य आगमों की अपेक्षा भगवतीसूत्र अधिक विशाल में जुटे हुये हैं, किन्तु अणु के सम्बन्ध में जिस सूक्ष्मता से है। विषय-वस्तु की दृष्टि से इसमें विविधता है। ज्ञान-विज्ञान भगवान महावीर ने चिन्तन किया है उतनी सूक्ष्मता से आधुनिक का शायद ही ऐसा कोई पहलू हो जिसकी चर्चा इसमें न की वैज्ञानिक भी नहीं कर पाये हैं। आज का वैज्ञानिक जिसे अणु गई हो। विश्व विद्या की दृष्टि से कोई ऐसी विद्या नहीं है कहता है, भगवान् महावीर ने उसे स्कन्ध कहा है। महावीर जिसकी चर्चा इस आगम में नहीं हुई हो। इस दृष्टि से इसे की दृष्टि से अणु बहुत ही सूक्ष्म है। परमाणु पुद्गल अविभाज्य प्राचीन जैन ज्ञान का विश्वकोश कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति है, अछेद्य है, अभेद्य है, अदाह्य है। ऐसा कोई उपाय या नहीं होगी। समवायांगसूत्र में यह बताया गया है कि अनेक विचार नहीं है जिससे उसका विभाग किया जा सके, अग्नि देवताओं, राजाओं और राजऋषियों ने भगवान् महावीर से उसे जला नहीं सकती, मेघ उसे गीला नहीं कर सकता, नदी विविध प्रकार के प्रश्न पूछे, भगवान् ने उन सभी प्रश्नों का उसे बहा नहीं सकती। वह न तो लम्बा है और न ही चौड़ा है उत्तर दिया। और न ही गहरा है। वह न आदि है, न मध्य है, न अन्त है। प्रस्तुत आगम एक श्रुतस्कन्ध, एक सौ एक अध्ययन, जिसका आदि अन्त एक हो, जो इन्द्रियग्राह्य नहीं है, अविभागी दस हजार उद्देशनकाल, दस हजार समुद्देशन काल, छत्तीस है, ऐसा द्रव्य परमाणु है। हजार प्रश्न और उनके उत्तर रूप में निबद्ध है। ___ परमाणु की शाश्वतता या अशाश्वतता के विषय में भगवतीसूत्र का प्रारम्भ गणधर गौतम की जिज्ञासा से गौतम की जिज्ञासा को शान्त करते हुये भगवान् महावीर ने होता है। इसमें गौतम की जिज्ञासा है तो भगवान् महावीर का समाधान है। उपनिषद् कालीन उद्दालक के समक्ष जो स्थान द्रव्य दृष्टि से परमाणु शाश्वत है, वह हमेशा रहा है और रहेगा, श्वेतकेत का है. गीता के उपदेष्टा भगवान कष्ण के समक्ष जो किन्त पर्याय दृष्टि से परमाण अशाश्वत है। पर्याय हमेशा स्थान अर्जुन का है, वही स्थान भगवान् महावीर के समक्ष परिवर्तनशील है उसमें परिवर्तन होता रहता है। गणधर गौतम का है। परमाणु को विभिन्न रूपों में परिभाषित किया गया है। विषय-वस्तु की दृष्टि से भगवतीसूत्र का क्षेत्र व्यापक १. परमाणु समस्त भौतिक अस्तित्व का आधार है। है। अध्यात्मविद्या और तत्त्वविद्या से लेकर सृष्टिविद्या, जीव २. अछेद्य, अभेद्य, अग्राह्य, अदाह्य, निर्विभागी पुद्गल विज्ञान, परमाणु विज्ञान, शरीर विज्ञान तक के अनेकानेक खण्ड को परमाणु कहते हैं। * पुस्तकालयाध्यक्ष, पार्श्वनाथ विद्यापीठ, आई०टी०आई० रोड, करौंदी, वाराणसी
SR No.525067
Book TitleSramana 2009 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreeprakash Pandey, Vijay Kumar
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2009
Total Pages100
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size14 MB
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