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________________ गाहा सुरसुंदरी चरिअं पंचम-परिच्छेदः पुरुषनो उपदेश: अह सो दट्ठूण ममं विद्दाण- मुहं गलंत नयणिल्लं । कर - यल-निमिय- कवोलं एवं भणिउं समाढतो ।। १ ।। संस्कृत छाया अथ स दृष्ट्वा मां विद्राणमुखं गलन्नयनवन्तम् । करतलन्यस्तकपोल - मेवं भणितुं समारब्धः । । १ । । गुजराती अर्थ पछी म्लान मुखवाळा आंखमांथी झरता अश्रुवाळा अने हथेळीमां मुकेला गालवाळा मने जोईने ते आ प्रमाणे कहेवा लाग्यो, हिन्दी अनुवाद फिर मुरझाये हुए मुखवाले, नयनों से गिरते अश्रुवाले और हथेली पर रखे हुए गालवाले मुझे देखकर वह इस प्रकार कहने लगा । गाहा सुंदर! तुह सरिसाणं उत्तम- पुरिसाण जुज्जइ न काउं । अहम-जण- समाइन्नो अप्प - वहो कुगइ - संजणणो ।। २ ।। संस्कृत छाया सुन्दर ! तव सदृशाना अधमजन समाचीर्ण आत्मवधः - मुत्तमपुरुषाणां युज्यते न कर्तुम् । कुगति - सञ्जननः ।। २ ।। गुजराती अर्थ हे. हे सुन्दर ! तमाय जेवा उत्तम पुरुषोने आवी अधम लोकोथी आचरित अने दुर्गतिदायक एवी आत्महत्या करवी योग्य नथी. हिन्दी अनुवाद हे सुन्दर ! आप जैसे उत्तम पुरुषों को अधम लोगों के द्वारा आचरित और दुर्गतिदायक आत्महत्या करनी योग्य नहीं है । 219
SR No.525062
Book TitleSramana 2007 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreeprakash Pandey, Vijay Kumar
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2007
Total Pages230
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size7 MB
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