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________________ हिन्दी अनुवाद :- इस प्रकार पिता द्वारा कही हुई वह बाला लज्जा से अधोमुखी हुई, किन्तु पूछने पर भी उसने कुछ प्रत्युत्तर नहीं दिया। गाहा : तो चिंतिउं पयत्तो एया लज्जालुया इमा वरई । न हु सक्कइ वज्जरिउं एसो मह ताय ! इट्ठोत्ति ॥१५९॥ छाया: ततः चिंतयितुं प्रयतः एषा लज्जालुता इयं वराली। न खलु शक्नोति कथयितुं एषः मम तात ! इष्ट इति ।।१५९|| अर्थ :- त्यारपछी राजा विचारवा लाग्या आ शरमाळ बीचारी शरमना मारे कहेवा माटे समर्थ नथी, आथी मारे ज एनो इष्ट पति करी आपवो पडशे. हिन्दी अनुवाद :- तत्पश्चात् राजा सोचने लगे कि यह बेचारी लज्जावश मुझसे कहने में समर्थ नहीं है अतः मुझे ही इसका इष्ट पति करना होगा। गाहा : ता चिंतेमि सयंचिय अणुरूवमिमीए पवर-भत्तारं । विन्नाण-रूव-संपय-कलियं वर-वंस-उप्पन्नं ॥१६०॥ छाया: तस्मात् चिन्तयामि स्वयमेव अनुरूप-मस्यै प्रवर-भर्तारं । विज्ञात-रूप-सम्पत्-कलितं वर-वंशोत्पनम् ।।१६०।। अर्थ :- त्यारपछी स्वयम् ज विचारे छे, आणीने अनुरूप श्रेष्ठ रूपसम्पत्तिथी युक्त श्रेष्ठकुलमां उत्पल्ल थयेलो श्रेष्ठ पति कोण छे ? हिन्दी अनुवाद :- फिर स्वयं ही विचारते हैं। इनके अनुरूप श्रेष्ठ रूप-सम्पति से युक्त और श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुआ इनका पति कौन है ? गाहा : खणमेगमच्छिऊणं राया चिंताउरो भणइ तत्तो । पुत्ति ! तुह रूव-सरिसो भत्ता लद्धो मए इण्हिं ॥१६१।। छाया: क्षणमेक आसित्वा राजा चिन्तातुरो भणति ततः। पुत्रि ! तव रूप-सदृशो भर्त्ता लब्धो मया इदानीम् ।।१६१।। अर्थ :- क्षण एक विचारीने चिन्तातुर एवो राजा कहे छे. पुत्रि ! तारा रूपसमान तारो पति अत्यारे मारा वड़े मेळवायो छे. हिन्दी अनुवाद :- एक क्षण सोचने के पश्चात् चिन्तातुर राजा कहता है - हे पुत्री ! तेरे रूप के तुल्य तेरा पति मैंने अभी निश्चित किया है। कनकवतीना स्वामी रूपे सुग्रीवनी पसंदगा गाहा : सिद्धत्थपुरे राया सुग्गीवो नाम मह परं मित्तं । तस्स तुमं गच्छ लहं सयंवरा, एत्थ किं बहुणा ? ॥१६२।। 29 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525054
Book TitleSramana 2004 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivprasad
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2004
Total Pages162
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size7 MB
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