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________________ चंद्रवेध्यक प्रकीर्णक की विषय वस्तु का मूल्यांकन __ डॉ० हुकमचंद जैन* यह निर्विवाद सत्य है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज के विकास में धर्म का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। जहाँ धर्म है वहाँ धार्मिक ग्रन्थ हैं। जैसे वेद हिन्दुओं के लिए, अवेस्ता पारसियों के लिए, बाइबिल ईसाइयों के लिए, कुरान मुसलमानों के लिए, त्रिपिटक बौद्धों के लिए महत्त्वपूर्ण है। इसी तरह जैनों के लिए आगम साहित्य का महत्त्व है। तीर्थंकरों की वाणी ही आगमों में संकलित है। वर्तमान में आगमों के अंग, उपांग, छेदसूत्र, मूलसूत्र, प्रकीर्णक आदि विभाग किये गये हैं। सामान्यतया प्रकीर्णक का अर्थ विविध विषयों पर संकलित ग्रन्थ ही किया गया है। अलग-अलग परम्परा अपनी संख्या अलग-अलग बताती है। समवायांगसूत्र में चोरासीह पण्णग सहस्साहं पण्णता कह कर ऋषभदेव के चौरासी हजार शिष्यों के चौरासी हजार प्रकीर्णकों का उल्लेख किया गया है। महावीर के तीर्थ में चौदह हजार साधुओं का उल्लेख प्राप्त होता है। अत: उनके तीर्थ में भी प्रकीर्णकों की संख्या चौदह हजार मानी गयी है। किन्तु आज प्रकीर्णकों की संख्या १० ही मानी गयी है। (१) चतुःशरण (२) आतुरप्रत्याख्यान (३) संस्तारक (४) चन्द्रवेध्यक (५) गच्छाचार (६) तन्दुलवैचारिक (७) देवेन्द्रस्तव (८) गणिविद्या (९) महाप्रत्याख्यान (१०) मरणसमाधि। कुछ विद्वान् २२ प्रकीर्णक मानते हैं। मत जो कुछ भी रहा हो किन्तु चन्द्रवेध्यक का नाम सभी में है। चन्द्रवेध्यक प्रकीर्णक एक पद्यात्मक रचना है। यह नाम सर्वप्रथम नंदी एवं पाक्षिकसत्र में मिलता है। पाक्षिकसत्र वृत्ति में चन्द्रवेध्यक का अर्थ यंत्र पुतलिका की आंख के गोलक से है तथा विद्ध का अर्थ बिंधना या भेदन करना है। यह जीवन लक्ष्य की प्राप्ति करने वाला ग्रन्थ होने के कारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। चन्द्रकवेध्यक नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इस ग्रन्थ में आचार के जो नियम आदि बताये गये हैं, उनका पालन करना चन्द्रवेध्यक के समान कठिन है। इस ग्रन्थ के सात द्वारों से सात गुणों का वर्णन किया गया है। विनय गुण - चन्द्रवेध्यक प्रकीर्णक में विनय का स्वरूप समझाते हुए कहा है जो छ: प्रकार के जीव निकायों के संयम का ज्ञाता और शान्त चित्त वाला हो वह निश्चित ही विनीत कहा जाता है। इस प्रकार उत्तराध्ययनसूत्र में मुख्य रूप से श्रमणाचार तथा * सह आचार्य, जैन विद्या एवं प्राकृत विभाग, सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज०) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525054
Book TitleSramana 2004 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivprasad
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2004
Total Pages162
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size7 MB
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