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होता है, जब हम उसके बनाने वाले नहीं हैं तो हमें उसको बिगाड़ने, पशु वध करने अथवा वन संपदा नष्ट करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है ।
पर्यावरण को दूषित होने से बचाने के लिए जैन धर्मोक्त जीवन पद्धति को स्वीकार करने के सिवाय कोई अन्य उपाय नहीं है। जैन धर्म ने पर्यावरण संरक्षण को काफी महत्व दिया है। मानव सभ्यता के प्रारम्भ में ही भगवान् ऋषभदेव ने पर्यावरण संरक्षण और जैविक संतुलन बनाये रखने के लिये सशक्त सिद्धान्तों की स्थापना की थी तथा इस पृथ्वी के छोटे से छोटे प्राणी वनस्पति व सूक्ष्म जीवों की रक्षा एवं सम्मान की प्रेरणा दी थी जो कि स्थिर पर्यावरण हेतु अत्यन्त उपयोगी है।
यदि जीवन उज्ज्वल बनाना है तो धर्म करना जरूरी है।
यदि स्वास्थ्य बचाना है तो साधना करना जरूरी है।
यदि पर्यावरण संरक्षण करना है तो जैन धर्म के सिद्धान्तों पर चलना जरूरी है। क्योंकि
सन्दर्भ
जैन धर्म की शरण में जो होगा जीवन समर्पित ।
अहिंसा, अपरिग्रह और संयम से होगा पर्यावरण संरक्षित ।
१. आचारांग, शीतोष्णीय ६९
२. दशवैकालिकसूत्र ४/८
३. वीरोदय १९/२९ ४. दशवैकालिकसूत्र ६ / १० ५. तत्त्वार्थसूत्र ५/२१
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