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________________ ४० मंगलजयसद्दकयालोए, अणेगगणनायग-दंडनायग-राईसर-तलवर-माडंबिय-कोडबियमंति-महामंति-गणन-दोवारिय-अमच्च-चेड-पीढमद्द-नगर-निगमतिसिट्ठि-सेगावइसत्यवाह-दूय-सन्धिवालसद्धिं संपुरिवुडे' इसका अभिप्राय है राजा सिद्धार्थ कल्पवृक्ष की भांति मुकुटवस्त्रों आदि से विभूषित 'नरेन्द्र' थे (प्राचीनसाहित्य में प्राय: नरेन्द्र का प्रयोग राजाओं के लिए हुआ है) इस नरेन्द्र के नीचे निम्न लोग पदाधिकारी थे(१) दण्डनायक, (२) युवराज, (३) तलवार (कोतवाल), (४) माडम्बिक, (चुंगी अध्यक्ष), (५) कौटुम्बिक, (६) मन्त्री, (७) महामन्त्री, (८) गणक, (९) दौवारिक, (१०) अमात्य, (११) चेट, (१२) पीठमईक, (१३) नागर, (१४) निगम, (१५) श्रेष्ठी, (१६) सेनापति, (१७) सार्थवाह, (१८) दूत, (१९) सन्धिपाल। इन्हीं लोगों से राजा सिद्धार्थ परिवृत्त था। आवश्यकचूर्णि में भी यही वर्णन मिलता है। यदि जाकोबी के मतानुसार सिद्धार्थ केवल अमीर होता तो श्रेष्ठी शब्द का प्रयोग किया जाता न कि राजा का। क्षत्रिय का अर्थ साधारण क्षत्रिय के अतिरिक्त राजा भी होता है। इसकी पुष्टि टीकाकारों और कोशों से होती है। अभिधानचिन्तामणि, पृष्ठ ३४४ पर लिखा है "क्षत्रं तु क्षत्रियो राजा राजन्यो बाहुसंभवः।" । इसके अनुसार क्षत्रिय, क्षत्र आदि शब्दों का प्रयोग राजा के लिये भी होता है। प्रवचनसारोद्धार, पत्र ८४ में लिखे 'महसेणे य खत्तिए' पर टीकाकार लिखता है "चन्द्रप्रभस्य महासेन: क्षत्रियो राजा"। इससे यह स्पष्ट है कि यह प्राचीन परम्परा रही है कि राजा के स्थान पर ग्रन्थकार क्षत्रिय शब्द का भी प्रयोग कर देते हैं। हमारे इस मत की पुष्टि ट्राइब्ज इन एन्शियण्ट इण्डिया में डॉ० विमलचरण ला ने भी की है। 'Savaraswami in his commentary in the Purvamimansa Sutra, Book II, says that the word 'raja' is a synonyam for Ksatriya, and states that even in his time the word was used by the Andhras to designate a Ksatriya'. Ibid, book page 322. पूर्वमीमांसासूत्र की टीका में शवरस्वामी ने लिखा है कि राजा शब्द क्षत्रिय का पर्याय था और टीकाकार के समय में भी आन्ध्र लोग राजा शब्द का प्रयोग क्षत्रिय के लिए करते थे। निरयावलियाओ (पृष्ठ २७) के अनुसार वज्जीगणसंघ का अध्यक्ष राजा चेटक था, इसकी सहायतार्थ संघ में से ९ लिच्छवि और ९ मल्ल शासनकार्य चलाने के लिए चुन लिये जाते थे। ये गणराजा कहाते थे। इस गणसंघ में जातकों के अनुसार ७७०७ सदस्य थे, जो राजा कहलाते थे। उन में से प्रत्येक का उपराज, सेनापति, भाण्डागारिक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525044
Book TitleSramana 2001 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivprasad
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2001
Total Pages226
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size9 MB
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