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________________ ११४ संगति में रहोगे, आवश्यक होने पर दूसरों को अपना धन नहीं दोगे और यदि युद्ध के मैदान में पीठ दिखाओगे तो तुम्हारा वंश नष्ट हो जायेगा।' इसी शिलालेख में इस राज्य का विस्तार भी दिया हुआ है- 'उच्च नन्दगिरि उनका किला था। कुवलाल राजधानी थी। ९६ हजार देशों पर आधिपत्य था। निर्दोष जिनेन्द्रदेव उनके देवता थे। युद्ध में विजय ही उनका साथी था। जैनमत उनका धर्म था और दद्दिग तथा माधव बड़े प्रेम के साथ पृथ्वी का शासन करते थे (वही, भाग २, लेख क्रमांक २९७)। उदयेन्दिरम् तथा कुच्चलू के दानपत्र भी इस घटना का उल्लेख करते हैं। एक अन्य शिलालेख के अनुसार माधव ने सिंहनन्दि की आज्ञा से उस शिलास्तम्भ को अपनी कृपाण के एक ही बार से काट डाला जो साम्राज्य की देवी के प्रवेश मार्ग को अवरुद्ध किये हुए था। उपर्युक्त सभी शिलालेख बारहवीं शताब्दी के हैं जबकि गंगराज्य दूसरी से ग्यारहवीं शताब्दी तक ही रहा है। लगता है, चूंकि समूचा गंगराज्य जैनधर्म का प्रारम्भ से अन्त तक अनुयायी रहा है और उसने जैन संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर जनकल्याण किया है, इसलिए उसके समाप्त होने पर भी जनमानस गंग राजाओं का विस्मरण नहीं कर सका। किसी के अस्तित्व में न रहने पर भी यदि कोई उसकी सत्कार्य-गाथा गाता है तो वही वास्तविक मूल्यांकन कहा जाना चाहिए। लुईराईस ने इस प्राचीन परम्परा को स्वीकारा है और सालेतोर ने शिलास्तम्भ की घटना को बौद्धधर्म से जोड़ा है (मैसूर गजेटियर, ११०३०८-१०, मिडिवल जैनिज्म, पृ० १५)। सम्भव है, बौद्धधर्म सिंहनन्दि के काल में दक्षिण में लोकप्रिय हो गया हो और माधव ने उसके स्थान पर जैनधर्म को लोकप्रिय बनाया हो। गंगवंश की प्रथम राजधानी मैसूरवर्ती पालार नदी के तट पर स्थित कुवलाल (कोलार) थी। बाद में उसे माधव के प्रपौत्र हरिवर्मन ने काबेर नदी के तट पर स्थित तलकाड में स्थानान्तरित किया और फिर श्रीपुरुष ने मान्यपुर (बेंगलोर के समीप) को अपनी राजधानी बनाया। हरिवर्मन् के भाई आर्यवर्मन् तथा कृष्णवर्मन् ने इस वंश की क्रमश: पेरूर और कैवार शाखा का सूत्रपात किया। इसके बाद हरिवर्मन के पुत्र विष्णुगोप, विष्णुगोप के पुत्र पृथ्वीगंग, पृथ्वीगंग के पुत्र तडंगल माधव 'तृतीय' और तडंगल माधव के पुत्र अविनीत कोगुणि (४००-४८२ ई०) क्रमश: राजा हुए। अविनीत एक पराक्रमी और धर्मात्मा नरेश था। विजयकीर्ति उसके राजगुरु थे। उसने अपने पुत्र दुर्विनीत की शिक्षा-दीक्षा सम्भवत: आचार्य देवनन्दि पूज्यपाद (४६४-५२४ ई०) के सानिध्य में करायी। पूज्यपाद तलकाडु की प्रधान जैन बसदि के प्रधान भी थे। श्रवणबेलगोल के शिलालेख (क्रमांक १०५/२५४) के अनुसार पूज्यपाद का प्राथमिक नाम देवनन्दि था, जो उनके गुरु ने दिया था। बुद्धि की प्रकर्षता और गम्भीरता के कारण उन्हें जिनेन्द्रबुद्धि कहा जाता था। जब से देवताओं ने उनकी चरण वन्दना की तब से वे पूज्यपाद हो गये। पूज्यपाद के Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525044
Book TitleSramana 2001 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivprasad
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2001
Total Pages226
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size9 MB
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