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पुस्तक
लेखक श्री विजय जनक चन्द्र सूरि
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समता-ध्यान-साधना एवं अभिप्राय
प्रकाशक - विजयसमुद्रसूरि स्मृति प्रकाशनमाला, रानी पाली, राजस्थान ।
संस्करण
पुस्तक-समीक्षा
मूल्य
जैन श्रमण, श्रमणियों की दिनचर्या में आवश्यक क्रियाओं के साथ-साथ स्वाध्याय और ध्यान-साधना की प्रमुखता रही है । किन्तु धीरे-धीरे ध्यान-साधना और उसकी आम्नायें बताने वाले श्रमण घट रहे हैं ।
प्रकाशक
संस्करण
इस पुस्तक के माध्यम से श्री विजय जनक चन्द्र सूरि जी ध्यान-साधना एवं उसके अभिप्राय आदि पर विस्तृत प्रकाश डाला है । यह पुस्तक ध्यान-साधना करने वाले साधकों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगी ।
पुस्तक उपयोगी है।
संग्रहणीय है ।
प्रथम (१९९३)
ध्यानाभ्यास
पुस्तक- अमीधारा
लेखिका - साध्वी अक्षय जी 'आखा '
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प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका ने अपने जीवन के संस्मरणों को एकत्र कर प्रस्तुत किया है। इसमें तीन घट हैं, जिसमें से प्रथम घट लेखिका ने स्वयं तैयार किया है, जिसमें उन्होंने अपनी अनुभूतियों को चित्रित किया है । दूसरा घट अन्य शिष्याओं एवं भक्तगणों ने तैयार किया तथा तृतीय घट में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपके सम्बन्ध में छपे समाचार आदि हैं । इस पुस्तक का नाम 'अमीधारा' ( अमृतधारा ) अत्यन्त सुन्दर है । इसमें अमृत से भरे तीन घट ( कलश ) हैं जो नीरस, दुर्बल एवं उदास जीवनों में चैतन्य से भरे जीवन रस का संचार करेंगे।
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के० ज्ञानचन्द जैन एण्ड कम्पनी, २३१ सदर बाजार दिल्ली ।
प्रथम ( १९९४ )
कृति की भाषा सरल एवं सुबोध है । साज-सज्जा आकर्षक है। ग्रंथ पठनीय एवं
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