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श्रमण, जुलाई-सितम्बर, १९९१ १६ वीं शताब्दी में ही कवि शाह ठाकुर अपभ्रंश भाषा के प्रसिद्ध कवि हुए हैं। ___ कवि ठाकुर ने शान्तिनाथ पुराण की प्रशस्ति में अपना परिचय दिया है। अपनी गुरु परम्परा में बताया है–भट्टारक पद्मनन्दि की आम्नाय में होने वाले भट्टारक विशालकीर्ति के शिष्य थे । इन्के पितामह का नाम साह सील्हा और पिता का नाम खेत्ता था। ये खण्डेलवाल जाति के थे तथा गोत्र लोहडिया था यह लोवा इणिपुर के निवासी थे । इनके द्वारा रचित दो पुराण उपलब्ध है --
१. शान्तिनाथ पुराण-इस पुराण में ५ सन्धियाँ हैं जिनमें १६वें तीर्थंकर शान्तिनाथ का जीवन वृत्त वर्णित है इसकी रचना वि० सं० १६५२ भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन चकत्तावंश जलालुद्दीन अकवर बादशाह के शासनकाल में पूर्ण हुई थी।
२ महापुराण कलिका—इस पुराण में २७ मन्धियाँ है जिनमें ६३ शलाकापुरुषों की गौरव कथा गुम्फित है। इस ग्रन्थ की रचना वि० सं० १६५० में मानसिंह के शासन में ही हुई थी।
ठाकुर द्वारा रचित “शान्तिनाथ पुराण" की हस्तलिखित प्रति आमेर शास्त्र भण्डार, जयपुर में उपलब्ध है।
इनके अतिरिक्त कवि देवचन्द्र कृत "पासपुराण' की हस्तलिखित प्रति सरस्वती भवन, नागौर में उपलब्ध है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि अपभ्रंश भाषा में उपलब्ध पुराणों की परम्परा का आरम्भ ७वीं-८वीं शताब्दी के प्रसिद्ध कवि स्वयम्भू द्वारा हुआ, पश्चात् ये पुराण निरन्तर १७वीं शताब्दी तक लिखे जाते
द्वारा/श्री बलराम सिंह बिश्नोई २१, पटेल नगर, मुजफ्फरनगर
१. तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा, पृ० २३३-२३४ २. वही, पृ० २३५ ३. अपभ्रंश भाषा और साहित्य की शोध प्रवृत्तियाँ, पृ. १६३ ४. वही, पृ० १४७
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