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________________ जैनविद्या - 19 द्रव्य कर्म आठ होते हैं जिनको दो भेदों में विभाजित किया गया है - घातिया और अघातिया । दर्शनावरणीय, ज्ञानावरणीय, मोहनीय और अन्तराय कर्म आत्मा के गुणों को घातते हैं अतः ये घातिया कर्म कहलाते हैं । आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय कर्म आत्मा के गुणों का घात नहीं करते हैं अतः उन्हें अघातिया कर्म कहा जाता है। 46 कर्मों की अवस्था से सम्बन्धित कतिपय शब्दों का विशिष्ट प्रयोग किया जाता है, यथा उत्कर्षण, संक्रमण, अपकर्षण, उदीरणा, उदय, उपशान्त, निधत्त तथा निकाचित। इन शब्दों के प्रयोग और प्रयोजन विशिष्ट होने से आज ये सभी पारिभाषिक शब्द बन गए हैं। कर्मबंध, स्थिति तथा रस-फल का बढ़ना वस्तुतः उत्कर्षण कहलाता है। किसी कर्मरूप प्रकृति का किसी अन्यकर्म प्रकृति रूप में बदलना संक्रमण तथा किसी कर्म की स्थिति या अनुभाग का कम होना कहलाता है - अपकर्षण । अनोदय कर्म को उदय में लाना उदीरणा और कर्म का स्वकाल में प्राप्त फल देना वस्तुतः कहलाता है - उदय' । जो कर्म उदीरणा अवस्था को प्राप्त न हो सके उसे उपशान्त और जो कर्म उदीरणा तथा संक्रमण दोनों से वंचित रहें उसे निधत्त कहतें हैं। जिस कर्म की उदीरणा, संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षण अवस्थायें न हों अर्थात् जिनका फल देना सुनिश्चित हो उसे कहते हैं - निकाचित । ज्ञान और श्रद्धान अन्योन्याश्रित सम्बन्ध रखते हैं। श्रद्धान के बिना ज्ञान और बिना ज्ञान के श्रद्धान कभी पूर्ण नहीं हो पाते। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इनके बन्ध में वे सभी कारण पृथक्पृथक् रूप से आधारभूत हैं । जो-जो कर्म-बंध के कारण हैं उन सबका अभाव ही बन जाता है - निवारण। ज्ञानवंतों की अविनय करना, ज्ञान-प्राप्ति तथा ज्ञान-दान में अन्तराय उत्पन्न करना, जो ज्ञान प्रशंसनीय है उसकी निर्बाध अनुशंसा न करना तथा उसके प्रति द्वेष रखना, साथ ही ज्ञानवंतों की तृषा और क्षुधा - शान्ति में व्यवधान उत्पन्न करना, सिद्ध- प्रसिद्ध धार्मिक मान्यताओं अथवा धारणाओं में दूषण लगाना, तात्त्विक बातों में अभिरुचि न लेना तथा उनके साथ द्वेष रखना, ज्ञान को छिपाना, अपने गुरु के नाम को उजागर न करना, किसी के प्रशंसित प्रवचनों पर रोक लगाना तथा निन्दा करना - ये सब कारण हैं जिनसे दर्शनावरणीय और ज्ञानावरणीय कर्म बँधते हैं । उपर्यंकित कारणों के विपरीत आचरण करने से दर्शनावरणीय और ज्ञानावरणीय बंध के निवारण होते हैं। मोह वस्तुतः कर्मबंध का मेरुदण्ड है। मोह के वशीभूत प्राणी मिथ्यात्व से प्रभावित हो जाता है । भव-भ्रमण का मूलाधार है - मोह । मोह कर्म-बंध को दो भेदों में विभक्त किया गया है - I (1) दर्शन मोह और ( 2 ) चारित्र मोह |
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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