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जैनविद्या - 19 में रचित 'जीवतत्त्वप्रदीपिका टीका' और (5) 1761 ई. में जयपुर में पं. टोडरमल द्वारा ढूंढारी भाषा में रचित 'सम्यक्ज्ञान-चन्द्रिका टीका।'
षट्खण्डागम आदि सिद्धान्त ग्रन्थों में पारंगत होने के फलस्वरूप आचार्य नेमिचन्द्र 'सिद्धान्तचक्रवर्ती' के रूप में विख्यात हुए। गोम्मटसार से इनके गुरु आदि का कोई स्पष्ट परिचय नहीं मिलता है । गोम्मटसार के अतिरिक्त त्रिलोकसार (973 ई.), लब्धिसार, क्षपणसार और कर्मप्रकृति इनकी रचनाएँ मानी जाती हैं, जिनमें प्रथम तीन ही उपलब्ध हैं। द्रव्यसंग्रह नामक ग्रन्थ की रचना का श्रेय भी शरदचन्द्र घोषाल और पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री ने इन्हें दिया है जबकि पं. जुगलकिशोर मुख्तार ने उसे परवर्ती किसी अन्य नेमिचन्द्र की कृति माना है।
त्रिलोकसार की अन्तिम गाथा से विदित होता है कि उसके रचनाकार नेमिचन्द्र मुनि के गुरु श्रुतज्ञानी अभयनन्दि थे। कर्मकाण्ड की गाथा 408, 436 और 785 में भी ग्रन्थकार ने अभयनंदि का गुरु रूप में सादर उल्लेख किया है और गाथा 396, 436 और 785 में इन्द्रनन्दि, कनकनंदि और वीरनन्दि का भी उनके साथ गुरु-तुल्य सादर उल्लेख किया है। । यद्यपि चामुण्डराय के गुरु आर्य आर्यसेन के शिष्य आचार्य अजितसेन थे, वह नेमिचन्द्र को, जो कदाचित् उनके बालसखा रहे, गुरुवत सम्मान देते थे। श्रवणबेलगोला में बाहुबलि मूर्ति के प्रतिष्ठा महोत्सव में भी नेमिचन्द्र आचार्य अजितसेन के साथ रहे थे। कदाचित् मूर्ति की प्रतिष्ठा के उपरान्त उसकी देखरेख का दायित्व चामुण्डराय ने इन्हें सौंपा था और श्रवणबेलगोला मठ में रहते हुए इन्होंने अपने ग्रन्थों की रचना की थी। नेमिचन्द्र अपने विषय में पारंगत विद्वान लेखक थे। इनकी रचना गोम्मटसार इतनी लोकप्रिय हुई कि लोग तद्विषयक षट्खण्डागम और उस पर रचित विशद टीकाओं का अध्ययन करना भूल चले।
ज्योति निकुंज
चार बाग लखनऊ-226004