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________________ 34 जैनविद्या - 19 जोग पउत्ती लेस्सा, कसाय उदयाणुरंजिया होई। तत्तो दोण्णं कजं बंधचउक्कं समुद्दिठं॥490॥ अर्थात् कषायों के उदय से अनुरंजित (सहित) योगों की प्रवृत्ति का नाम ही लेश्या है। कर्मग्रहण करने की शक्ति का नाम योग है। अर्थात् अंगोपांग और शरीर नामकर्म के उदय से मनोवर्गणा, वचन-वर्गणा और काय-वर्गणा - इन तीन वर्गणाओं में से किसी एक वर्गणा का अवलम्बन करनेवाली-कर्म ग्रहण करने की जीव की जो शक्ति है उसी का नाम योग है। उस योग के उक्त तीन वर्गणाओं के अवलम्बन करने से तीन भेद हो जाते हैं, यथा - (1) मनोयोग, (2) वचनयोग, (3) काय योग। जिस वर्गणा का अवलम्बन होता है, योग का नाम भी वही होता है। किन्तु किसी भी एक योग से कर्म-नोकर्म सभी का ग्रहण होता है। इतना विशेष है कि एक समय में एक ही योग होता है। योगों से प्रकृति-बन्ध और प्रदेश-बन्ध होते हैं। जिस जाति की योग-प्रवृत्ति होती है उसी जाति का कर्म ग्रहण होता है। इस जीव के प्रति समय में अनन्तानन्त वर्गणाओं का समूहरूप एक समय-प्रबद्ध आता है। यथा - परमाणहि अणंतहि वग्गणसण्णा हु होदि एक्का हु। ताहि अणंतहि णियमा समयबद्धो हवे एक्को ॥ 245 ॥ गो.जी. अर्थात् अनन्त परमाणुओं की मिलकर वर्गणा संज्ञा है। ऐसी अनन्त वर्गणाओं का समूह समय-प्रबद्ध कहलाता है। समय-प्रबद्ध के आने में योग ही कारण है। योग के निमित्त से ज्ञानावरणादि अष्ट कर्म और आहारादि नोकर्म अनन्तानन्त परमाणुओं के परिणाम को लिये हुए खिंचे आते हैं । जो कर्म आते . हैं उनमें तीन प्रकार की वर्गणाएँ होती हैं - 1. गृहीत - जिनको इस जीव ने पहले भी कभी ग्रहण किया था। 2. अगृहीत - जिनको पहले कभी ग्रहण नहीं किया था। 3. गृहीतागृहीत - जिनमें से कुछ को पहले ग्रहण किया था कुछ नवीन ग्रहण किया है। योग के साथ ही कषायों का उदय रहता है। वह (कषाय का उदय) आए हुए कर्मों में स्थिति और अनुभाग बन्ध डालता है। आए हुए कर्म, आत्मा के साथ बँधे हुए कर्म कितने काल तक ठहरेंगे और उनमें कितना रस पड़ा है - यह कार्य कषायों का है। अर्थात् कर्मों में नियत काल तक स्थिति डालना और उनकी इस शक्ति में हीनाधिकता करना कषायों का कार्य है । जिस प्रकार योगों की तीव्रता से अधिक कर्मों का ग्रहण होता है उसी प्रकार कषायों की तीव्रता से कर्मों में स्थितिबन्ध अधिक पड़ता है, मन्द कषायों से मन्द पड़ता है। इस प्रकार प्रकृतिबन्ध व प्रदेशबन्ध योग से होते हैं और स्थितिबन्ध व अनुभाग बन्ध कषाय से होते हैं। योग-कषाय के समुदाय का नाम ही लेश्या है। इसलिये लेश्या ही चारों बन्धों का कारण है। लेश्या के दो भेद हैं - (1) द्रव्य लेश्या और (2) भाव लेश्या।
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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