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जैनविद्या - 19
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यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सम्यक्त्व का प्रतिबंधक मिथ्यात्व दर्शन मोहनीय परिवार का है जबकि क्रोधादि कषाएँ चारित्र मोह परिवार की हैं। इनके स्वभाव और कार्य भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं। अनंतानुबंधी कषाएँ सम्यक्त्व और चारित्र का घात करती हैं। यह उनकी द्वि-स्वमानता है। वस्तुतः कषायों से तत्त्व-श्रद्धानरूप सम्यक्त्व का घात नहीं होता है किन्तु जब मिथ्यात्व का अभाव होकर सम्यक्त्व प्राप्त होता है तब अनंतानुबन्धी कषाएँ उदय में नहीं रहतीं। अनंतानुबंधी कषायों की द्वि-स्वमानता का लक्षण सासादन गुणस्थान में प्रकट होता है, जहाँ मिथ्यात्व प्रकृति का उदय न होने से जीव को मिथ्यात्व तो नहीं होता किन्तु किसी एक अनंतानुबंधी कषाय के उदय से सम्यक्त्व का नाश हो जाता है।
(7) ज्ञान मार्गणा - जीवादि छह द्रव्यों, उनके गुणों और पर्यायों को प्रत्यक्ष-परोक्ष-रूप से जाननेवाला आत्मा का गुण ज्ञान कहलाता है। 'जानाति ज्ञायतेऽनेन ज्ञातिमात्रंवा ज्ञानं'। जो जानता है वह ज्ञान है, जिसके द्वारा जाना जाये सो ज्ञान है और जानना मात्र ज्ञान है । ज्ञानस्वभावी आत्मा स्व-पर प्रकाशक है। सविकल्प/साकार उपयोग-ये भी ज्ञान के नाम हैं । मोक्षमार्ग में ज्ञान की ही विशेष भूमिका है। स्वानुभूतिपूर्वक आत्मस्वभाव के प्रति श्रद्धान-ज्ञान एवं स्थिरता ही मोक्षमार्ग है।
ज्ञान के पाँच भेद हैं - मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान एवं केवलज्ञान। इनमें प्रथम चार ज्ञान क्षायोपशमिक हैं, केवलज्ञान क्षायिक है । ये पाँच ज्ञान सुज्ञान कहलाते हैं । कुमति, कुश्रुत एवं कुअविधज्ञान ये तीन मिथ्याज्ञान हैं जो मिथ्यात्व सासादन और मिश्र गुणस्थान तक होते हैं । इस प्रकार ज्ञानमार्गणा के आठ भेद हुए। गाथा 299 से 464 में ज्ञान का लक्षण, भेदप्रभेद, स्वामित्व, ज्ञानी-अज्ञानी जीवों की संख्या, गुणस्थान आदि का बेजोड़ वर्णन किया है जो अन्यत्र दुर्लभ है। बारह अंग और चौदह पूर्व के अक्षर, पदों, विषय आदि का भी वर्णन किया है। मति, श्रुत और अवधिज्ञान चौथे गुणस्थान अविरत सम्यग्दृष्टि से बारहवें गुणस्थान क्षीणमोह तक होते हैं। मनःपर्यय ज्ञान छठे प्रमत्त गुणस्थान से बारहवें गुणस्थान क्षीणमोह तक होता है। केवलज्ञान तेरहवें गणस्थान में होता है। मोक्षमार्ग में आत्मानुभूतिपूर्वक आत्मज्ञान ही सुज्ञान कहलाता है, शेष मोहयुक्त ज्ञान, कुज्ञान की श्रेणी में आता है । वस्तुतः मोह (मिथ्यात्व) के संयोग और वियोग से ज्ञान, कुज्ञान-सुज्ञान कहलाता है। इसी प्रकार मोक्षमार्ग में आत्मज्ञान विहीन आगम-ज्ञान अकिंचित्कर होता है।
(8) संयम मार्गणा - 'सम्यकयमो व संयम' सम्यक प्रकार से यम अर्थात् नियम ही संयम है। अहिंसादि व्रत, ईर्यादि समिति, क्रोधादि कषायों का निग्रह, तीन गुप्ति एवं स्पर्शनादि पाँच इंद्रियों का जीतना, इन पाँच व्रतों का धारण करना ही संयम है। शुद्धात्मा का ध्यान निश्चय संयम है। इस प्रकार संयम-निश्चय संयम और व्यवहार संयम रूप है। आगम में इसे वीतराग संयम एवं सराग संयम कहा गया है। व्यवहार में इसे इंद्रिय-संयम और प्राणी-संयम रूप में विभाजित किया है। सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसांपराय और यथाख्यात - संयम के ये पाँच भेद हैं। संयमासंयम और असंयम मिलाकर इनके धारक संयत के कुल सात भेद भी