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________________ जैनविद्या-12 83 पत्र 17 से 19 तथा 32 से 34 इस प्रकार दो स्थानों पर प्राप्य है । हमने प्रथम प्रतिलिपि को आधार मानकर अनुवाद किया है तथा द्वितीय प्रतिलिपि के पाठभेद फुट-नोट में दे दिये हैं। एक आध स्थल इसका अपवाद भी है जिन्हें हमने कोष्ठक में दे दिया है । रचनाकार का नाम, समय आदि तथा प्रतिलिपिकार और प्रतिलिपिकाल का उल्लेख भी गुटके में नहीं मिलता किन्तु रचना की भाषा के आधार पर अनुमान होता है कि वह 17वीं शताब्दी के आसपास की रचना है । भाषा प्राधुनिक हिन्दी के अधिक निकट प्रतीत होती है । विषय की दृष्टि से रचना का दार्शनिक महत्त्व है । जैनदर्शन के अनुसार मुक्ति प्राप्त करने की योग्यता के लिए जीव का भेदविज्ञानी होना आवश्यक है और उसके लिए सात तत्त्वों का ज्ञान और श्रद्धान का जागरण । जनदर्शन में सम्यग्दर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यक्चारित्र को मुक्ति का मार्ग बताया गया है और इन सात तत्त्वों का श्रद्धान ही सम्यग्दर्शन है । प्रस्तुत रचना में इनका यथावश्यक ज्ञान कराने का प्रयत्न किया गया है । रचना में अपभ्रंश के लगभग 275 शब्दों का प्रयोग किया गया है जिसकी वर्णक्रमानुसार सार्थ अनुक्रमणिका रचना के अन्त में संलग्न है। इस दृष्टि से अपभ्रंश के प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्ति में भी यह सहायक सिद्ध हो सकती है । यदि इससे पाठकगण कुछ भी लाभान्वित हुए तो हम समझेंगे कि हमारा प्रयास सफल हुआ। भंवरलाल पोल्याका अनुवादक
SR No.524760
Book TitleJain Vidya 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPravinchandra Jain & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1991
Total Pages114
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size10 MB
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