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________________ 157 जैनविद्या विभक्तिलोप की प्रवृत्ति ' प्राकृत भाषा में विभक्तिलोप की प्रवृत्ति नहीं है, जबकि अष्टपाहुड ग्रन्थों में यह प्रवृत्ति प्रायः देखने को मिल जाती है जिससे यह बात सामने आती है कि जो प्रवृत्ति अपभ्रश में है वही प्रवृत्ति कुन्दकुन्द के अष्टपाहुड ग्रन्थों में है । अपभ्रंश में ('स्यम्जस्-शसां लुक 4/344, षष्ठ्याः 4/345) प्रथमा/द्वितीया/चतुर्थी/षष्ठी एकवचन एवं बहुवचन में प्रत्यय लोप होता है । वही यहाँ निर्दिष्ट है प्रथमा एकवचनपढम मोक्खस्स । (दं.पा. 21) सिवमग्गे जो भव्वो। (सु. पा. 2) मय राय दोस मोहो । (बो. पा. 5) मिच्छादिट्टि जो सो संसारे संसरेइ सुहरहियो । (मो. पा. 95) प्रथमा बहुवचनतेसि पि पत्थि बोहि । (दं. पा. 13) छह दव्व । (दं. पा. 19) जे वावीस-परीसह सहति । (सू. पा. 12) द्वितीया एकवचनसेयासेयविदण्हू उधुददुस्सील सीलवंतो वि । (दं. पा. 16, सू. पा. 25, चा .पा. 2, 18) ण मुयइ पयडि । (भा. पा. 137) परमप्पय झायंतो। (मो. पा. 48) द्वितीया बहुवचनतस्स य दोस कहता। (दं. पा. 9) लहु चउगइ चइऊणं । (चा. पा. 45) चतुर्थी षष्ठी एकवचनजह मूलम्मि विणढे दुमस्स परिवार णत्थि पखड्ढी । (दं. पा. 10) पावोपहदि भावो सेवदि य प्रबंभु लिंगिरूवेण । (लि. पा. 7) चतुर्थी/षष्ठी बहुवचनसम्मत्तादो णाणं णाणादो सव्वभाव उवलद्धी। (दं. पा. 15) छिददि तरुगरण बहुसो। (लि. पा. 16) चोराण मिच्छवाण य जुद्ध विवादं च तिव्वकम्मेहि । (लिं. पा. 10) दंसण वय सामाइय पोसह सचित्त रायभत्ते य । बंभारंभपरिग्गह अणुमण उद्दिट्ट देसविरदो य ।। (चा. पा. 22)
SR No.524759
Book TitleJain Vidya 10 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPravinchandra Jain & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1990
Total Pages180
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size15 MB
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