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स्थरीकरण के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इससे अहिंसक व्यक्तित्व का निर्माण सम्भव है।
अहिंसा डरपोक और कायरों का मार्ग नहीं है। यह उन बहादुरों का मार्ग है जो मृत्यु के वरण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। आचार्य महाप्रज्ञ लिखते हैं-"भय हमारी मूर्छा है और अभय हमारी अमूर्छा । मूर्छा भय को जन्म देती है और भय हिंसा को। अमूर्छा से व्यक्ति अभय होता है और अभय से अहिंसक।" वे मृत्यु के भय को भी मौलिक नहीं मानते हैं। उनके अनुसार मौलिक भय है-आशंका अर्थात् वह छूट न जाये । पदार्थ की मूर्छा, पकड़ मौलिक भय है। अन्य सभी भय आरोपित भय हैं । मृत्यु का भय इसलिए होता है, क्योंकि व्यक्ति जानता है कि मरने के बाद सब कुछ छूट जायेगा। कहा गया है-- "शंकास्थानसहस्त्राणि भयस्थानशतानि च।दिवसे दिवसे मूढ़माविशन्ति न पंडितम्॥"
अर्थात् जो मूर्च्छित हैं उन्हें सैकड़ों भय रोज सताते हैं और जिसने मूर्छा को तोड़ दिया उसे न शंका सताती है और न भय । अतः प्रहार हिंसा पर नहीं, मूर्छा पर करना होगा। हिंसा भय का परिणाम है । जिस व्यक्ति ने लाठी का आविष्कार किया, जिसने पत्थर के शस्त्र और अणुशस्त्र बनाये, वह डरा हुआ व्यक्ति था। अभय होता तो न उसे पत्थर के शस्त्र की जरूरत होती और न अणु शस्त्रों की। अभय और अहिंसक बनने के लिए प्रवृत्ति के त्याग का पहला प्रयोग स्वयं पर करें फिर परिवार एवं पड़ौसियों पर । अहिंसा को जीवन में व्यापक बनाकर ही राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय शांति की बात सोची जा सकती है। एक ऐसा अहिसंक समाज, जिसमें शांति, स्वस्थता और अभय हो, प्रत्येक व्यक्ति को आश्वासन और अधिकारों के प्रयोग की स्वतंत्रता हो तो इस सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा कि अपने स्वार्थों और मूर्छा को सीमित किये बिना विश्वशांति और अहिंसक समाज का स्वप्न पूरा नहीं हो सकता।
सन्दर्भ:
The intellectual and moral satisfaction failed to gain from the Utilitarianism of Bantham & Mill, the revolutionary methods of Marx & Lenin, the special contact theory of Hobbes, the 'Book to Nature Optimism' of Rouseau and the superman philosophy of Nietzschey, I found in the non-violence resistance philosophy of Gandhi. Martin Luther King-Stric towards freedom, 1959.
Nathanial Altman, The Non-violent Revolution. 3. युवाचार्य श्री मधुकर मुनि, आचारांग सूत्र, जिनागम ग्रंथमाला, पृ. 145-46 4. जिनेन्द्र वर्णी, जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश, भाग-4, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, 1988, पृ. 531 5. H.L. Nicburg. 'Uses of Violence', Journal of conflict resolution, Vol. 7. March 1963,
PP 43-54, see also his political Violence: The Bchavioral Process, New York, 1969. 6. Le Roi Jones, "What Does Non-Violence Men?" Midstream, New York Vol. 9, De
cember, 1963, PP 33-62. 7. Mahendra Kumar, Violence & Nonviolence in International Relation, Thomson Press,
Delhi.1975, P.49.
तुलसी प्रज्ञा जनवरी-मार्च, 2002
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