________________
४०.
३८. धम्मत्थिकायधम्मो, पयारधम्मो य विसयधम्मो य । लोइय- कुप्पावयणिय', लोगुत्तर लोगऽणेगविहो || ३९. गम्म-पसु-देस-रज्जे, पुरवर-गाम-गण-गोट्ठि - राईणं' । सावज्जो उकुतित्थियधम्मो न जिणेहि तु पसत्थो || • दुविहो लोगुत्तरिओ, सुयधम्मो खलु चरित्तधम्मो य । सुयधम्मो सज्झाओ, चरित्तधम्मो समणधम्मो ॥ ४१. दव्वे भावे वि' य मंगलाणि दव्वम्मि पुण्णकलसादी । धम्मो उ भावमंगलमेत्तो 'सिद्धि त्ति" काऊणं ।। ४२. हिंसाए पडिवक्खो, होइ अहिंसा चउव्विहा 'सा उ" । दवे भावे य तहा, अहिंसऽजीवाइवाओ" ति" ॥ ४३. पुढवि-ग-अगणि मारय, वणस्सइ" बि ति चउ पणिदि अज्जीवे । पेहोपेह - पमज्जण, परिठवण मणो-वई काए ॥ ४४. अणसणमूणोयरिया, वित्तीसंखेवणं रसच्चाओ । arefrain संलीया, य बज्झो तवो होइ" ।।
१. ० वयणे (हा ) ।
२. गुट्टि ( अ, ब ) ।
३. राई ति ( जिचू) ।
४. जिणेसु (अचू) ।
५. मुनि श्री पुण्यविजयजी ने अचू में प्रस्तुत गाथा को नियुक्तिगाथा के रूप में स्वीकृत नहीं किया है। इसका भावार्थ गद्य रूप में दोनों चूर्णियों में उपलब्ध है ।
टीका तथा आदर्शों में भी यह नियुक्तिगाथा के क्रम में है
नहीं माना जा सकता । विषय की क्रमबद्धता की दृष्टि से प्रासंगिक लगती है ।
६. x (जिचू ) ।
७. ० लाई (हा) ।
८. सिद्धति ( ब ) |
९. हिंसा ( अ, ब ) ।
१०. ० अज्जीवा० ( ब ) |
११. ४२ से ४५ तक की गाथाएं टीका तथा सभी हस्तप्रतियों में उपलब्ध हैं। दोनों
व्याख्या मिलती है ।
हैं
किन्तु अगस्त्य सिंह
संयम और तप
चूर्णियों में गाथा का संकेत न होने पर भी इनकी विस्तृत कुछेक विद्वानों के अनुसार ये गाथाएं बाद में प्रक्षिप्त हुई चूर्णि (पृ. ११) की २०वीं गाथा की व्याख्या में कहा है कि निर्युक्ति विशेष से कहे जाएंगे अतः यहां इनका उल्लेख नहीं है । इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि ये गाथाएं चूर्णिकार के सामने निर्युक्तिगाथा के रूप में थीं । १२. वणसई (हा), वणसइ ( अ, ब ) ।
१३. होही (हाटी), तु० उसू ३०१८ ।
खण्ड २२,
अंक १
Jain Education International
अतः इसे प्रक्षिप्त
भी यह गाथा यहां
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org